बनबसा (चंपावत)। एक वर्ष बाद नेपाली बालक को उसके परिजन मिल गए। बुधवार को बनबसा स्थित एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट की मदद से उसे माईते नेपाल संस्था के सुपुर्द किया गया। संस्था नेपाली बालक को उसके परिजनों के सुपुर्द करेगी।
करीब एक वर्ष पहले नेपाल के ग्राम बिस्खेत मान्मा बाजार वार्ड संख्या 4 जिला कालीकोट, कर्णाली अंचल निवासी रमेश टम्टा (12) पुत्र स्व. हरीश टम्टा को उसके जीजी का भाई नेपाल से भारत ले आया। उसने बालक को भीमताल विकास खंड के एक ग्रामप्रधान के घर पर बाद में ले जाने की बात कहकर घरेलू काम पर लगा दिया।
छह माह तक नेपाली बालक ग्रामप्रधान के घर पर बर्तन धोने जैसे कार्य करता रहा, जिसके एवज में उसे केवल दो वक्त का खाना मिलता था। लगभग छह माह बाद वह प्रधान के घर से भाग गया और भीमताल में पैराशूट पैकिंग का कार्य करने लगा।
यहां भी उसे पैसे नहीं मिलते थे। इसके बाद वहां से वो हल्द्वानी पहुंचा। हल्द्वानी में वो रोते हुए बनबसा के लिए बस की तलाश कर रहा था। इसी बीच किसी व्यक्ति ने चाइल्ड हेल्पलाइन पर बालक के बारे में जानकारी दी। हेल्पलाइन उसे अपने साथ नैनीताल ले गई और काउंसलिंग की।
बाद में हेल्पलाइन ने उसे घर पहुंचाने के लिए ऊधम सिंह नगर की चाइल्ड हेल्पलाइन को सौंप दिया। बुधवार को चाइल्ड हेल्पलाइन के काउंसलर रहमत हुसैन उसे लेकर बनबसा एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट पहुंचे, जहां उक्त नेपाली बालक को नेपाल पुलिस की मौजूदगी में नेपाली संस्था माईते के सुपुर्द कर दिया गया।
गरीबी और हालात किसी को भी भटका देते हैं। ऐसा ही नेपाली बालक रमेश के साथ हुआ। रमेश स्कूल में पढ़ रहा था। उसने चौथी कक्षा तक पढ़ाई की। अचानक पिता की मौत के बाद उसकी मां ने दूसरा विवाह कर लिया। उसकी परवरिश तरीके से नहीं हो पा रही थी।
तंगी और परेशानी के हालातों में वो अपने जीजा के भाई की बातों में आ गया। एक दिन उसके जीजा का भाई उसे बहला फुसलाकर भारत ले आया। रमेश ने अमर उजाला को बताया कि उसे भारत में अच्छा नहीं लग रहा था। पढ़ाई उसे रास आती थी। भारत में भी काम के बदले पैसा नहीं मिला।