टनकपुर (चंपावत)। वेद में उल्लिखित धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष के इन चार पुरुषार्थों में से पहले दो तो कम से कम इन दिनों यहां लगे धार्मिक मेले में सार्थक होता दिख रहे हैं। 19 मार्च से शुरू मां पूर्णागिरि धाम के मेले से कारोबारी गतिविधियां भी बढ़ गईं हैं। इसका सकारात्मक असर पड़ोसी देश नेपाल के सिद्धबाबा की धरती ब्रह्मदेव मंडी पर भी दिख रहा है। ये मेला नेपाल के कारोबार और कारोबारियों के लिए संजीवनी साबित हो रहा है। सिद्धबाबा धाम के साथ ही नेपाल के इस बाजार में भी चहलपहल है।
पूर्णागिरि धाम और सिद्धबाबा धाम में भले ही 29 किमी की दूरी है, लेकिन देवी के दर्शन के बाद बाबा के दरबार में मत्था टेकने की मान्यता ने दोनों देशों में आध्यात्मिक समागम कराया है। इसका असर धर्म की इस एकरूपता के अलावा कारोबार पर भी पड़ा है। नेपाल में कपड़े, जूते-चप्पल, टॉर्च, इलेक्ट्रॉनिक के सामान की खूब बिक्री हो रही है। इस कारण वहां की 150 से अधिक दुकानों में चहलपहल होने से बाजार भी गुलजार है।
देवी भक्त सिद्धबाबा के दरबार में उमड़ रहे श्रद्धालु
टनकपुर (चंपावत)। पूर्णागिरि देवी के उपासक बाबा सिद्धनाथ के दरबार में सुबह से रात तक श्रद्धालुओं की आवाजाही है। मान्यता है कि सिद्धबाबा के पूजन के बाद ही देवी मां के दर्शन की पूर्णता होती है। इसी कारण पूर्णागिरि के दर्शन के बाद श्रद्धालु बाबा सिद्धनाथ के दर्शन के लिए इन दिनों ब्रह्मदेव आ रहे हैं। दरबार में लंबी कतार लग रही है। पुजारी गोविंद उप्रेती बताते हैं कि पूजन के बाद अखंड धूनी में विभूति लगाई जाती है।
ब्रह्मदेव के बाजार में दो साल बाद रौनक लौट आई है। कोरोना के कारण वर्ष 2020 और 2021 में कारोबार चौपट रहा। इसके नुकसान की भरपाई तो पांच साल में भी होना मुश्किल है। - दीपक जोशी, कारोबारी, ब्रह्मदेव।
मेला बढ़िया चल रहा है। श्रद्धालुओं के आने से बाजार भी बढ़ा है। पिछले दो साल में तो इस कदर नुकसान हुआ कि पुराने जूते-चप्पल और लाखों रुपये का सामान बर्बाद हो गया। - चेतराज पनेरू, कारोबारी, ब्रह्मदेव।
मैं स्नातक की पढ़ाई कर रहा हूं। दो साल बाद मेला फिर से चलने से पढ़ाई के साथ ही परिजनों के साथ कारोबार में भी हाथ बंटा रहा हूं। उम्मीद है कि अब हालात कुछ अच्छे होंगे। - अभिषेक, छात्र और कारोबारी।
हालत कुछ बेहतर हैं लेकिन अभी 2019 जैसा व्यापार नहीं है। लगता है कि लोगों के पास खरीद की सामर्थ्य भी कम हुई है। कमोबेश दो साल दुकानें बंद रहीं। तब खेतीबाड़ी से गुजारा किया। - शंकर सिंह कार्की, ब्रह्मदेव।