चंपावत। खेती के बाद सबसे ज्यादा लोग पशुपालन पर आश्रित हैं। लेकिन जिले में न पशुपालकों के हाल खास अच्छे हैं और न ही विभाग के। दूध के अलावा खेती में सहारा बनने वाले पशुओं की देखरेख के लिए न कायदे की व्यवस्था है और न ही विभागीय ढांचा ही मजबूत है। 15 पशु अस्पतालों में से चार में पशु डॉक्टर और 22 पशुधन प्रसार केंद्रों में से 12 में पशुधन प्रसार अधिकारी नहीं है।
पाटी ब्लॉक के भवान सिंह परवाल, कृष्णा भट्ट के मवेशी बीमार हुए, लेकिन इलाज के लिए उन्हें अपने गांव के पशु प्रसार केंद्र से कोई मदद नहीं मिल सकी। ये नौबत उनके गांव के पशुधन प्रसार केंद्र के पशुधन प्रसार अधिकारी की कुर्सी खाली होने से है। इन ग्रामीणों को अपने मवेशियों के इलाज के लिए 45 किमी दूर जाना पड़ा। यह एक बानगी भर है। पाटी क्षेत्र के किसी भी पशु अस्पताल में पशु डॉक्टर नहीं है।
जिले की 2.65 लाख की आबादी में से 1.34 लाख लोग पशुपालक हैं। 1.07 लाख गायों सहित करीब 2.43 लाख पशु हैं। भैंस, बकरी, सुअर, खरगोश, मुर्गी, घोड़े, खच्चर को भी यहां बहुतायत में पाला जाता है। एक दुधारू पशु रोजाना औसतन दो लीटर दूध दे रहा है। लेकिन फिर भी पशुपालकों की माली हालत नहीं सुधर पा रही है।
चंपावत पशु अस्पताल में दो साल से फार्मासिस्ट नहीं
जिले के सबसे बड़े चंपावत के पशु अस्पताल में औसतन हर रोज 20 से अधिक मवेशियों का इलाज किया लाता है, लेकिन यहां के मुख्य फार्मासिस्ट के दोनों पद खाली हैं। पशु चिकित्साधिकारी डॉ. जेपी यादव का कहना है कि इससे दवाओं के वितरण से लेकर इलाज में दिक्कतें आती हैं। अलबत्ता काम चलाने के लिए सप्ताह में तीन दिन दूसरे अस्पताल से यहां एक फार्मेसिस्ट को संबद्ध किया गया है।
इन चार पशु अस्पतालों में नहीं हैं पशु चिकित्सक
खेतीखान, पाटी, चल्थी और अंगूरा शशक प्रजनन केंद्र।
इन 12 पशुधन केंद्रों में नहीं हैं पशुधन प्रसार अधिकारी
मंच, तामली, सूखीढांग, ऊचौलीगोठ, खतेड़ा, बसेड़ी, पुलहिंडोला, रैगांव, देवीधुरा, जोश्यूड़ा, भिंगराड़ा और चौड़ामेहता।
कोट....
जिले के दो पशु अस्पतालों के डॉक्टर अध्ययन अवकाश पर हैं। जबकि दो अन्य अस्पतालों में डॉक्टर के पद खाली हैं। पशुधन प्रसार अधिकारियों की कमी दूरदराज के ग्रामीण क्षेत्रों की व्यवस्था को प्रभावित कर रही है। फिर भी शिविर लगाकर इलाज देने की व्यवस्था की गई है।
डॉ. बीएस जंगपांगी, मुख्य पशु चिकित्साधिकारी चंपावत