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बजट मिलने में ही लग गए 28 महीने

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चंपावत। करीब 60 हजार करोड़ रुपये की लागत से प्रस्तावित पंचेश्वर बांध परियोजना को भले ही हलचल अगस्त 2014 से शुरू हो गई थी, लेकिन इसकी रफ्तार बेहद धीमी है। बांध के संभावित डूब क्षेत्र में आने वाले पेड़ों की गिनती का काम 28 माह बाद फिर से शुरू हो गया है। हालांकि इसके पीछे वजह बजट नहीं होना बताया जा रहा था।
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पंचेश्वर बांध के डूब क्षेत्र में आने वाले इलाकों में 26 दिसंबर 2017 से पेड़ों की गिनती शुरू हुई। तब रैघांव, तोलागांव, सुंगारखाल, कोठेरा, बेट्टा, नेत्र सलान, बरयूड़ी आदि डूब इलाकों के वन क्षेत्रों में 70 हजार से ज्यादा पेड़ों पर लाल निशान लगा कर फरवरी 2018 तक गिना गया था। ये काम भी वन विभाग की रकम से ही हुआ। बजट नहीं मिलने से फरवरी 2018 के बाद पेड़ों को गिनने का काम बंद हो गया था। पेड़ों की गिनती के लिए कार्यदायी संस्था वापकोस कंपनी के माध्यम से वन विभाग ने सितंबर 2017 में 23.09 लाख रुपये का आगणन केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय की भेजा था। काली कुमाऊं के रेंजर हेम चंद्र गहतोड़ी का कहना है कि अब ये रकम मिल गई है। इसलिए पेड़ों की गिनती का काम फिर से शुरू कर दिया गया है। सितंबर तक गिनती का काम पूरा हो जाएगा। डूब क्षेत्र में करीब दो लाख पेड़ हैं।
बांध बना तो बनेगी 5040 मेगावाट बिजली
चंपावत। पंचेश्वर और इसके रेग्युलेटिंग बांध रूपालीगाड़ से 5040 मेगावाट बिजली का उत्पादन होगा। पंचेश्वर से 4800 और रूपालीगाड़ से 240 मेगावाट उत्पादन किया जाएगा। पंचेश्वर के अलावा रूपालीगाड़ में बनने वाले रेग्युलेटिंग बांध निर्माण के लिए भूमिगत सुरंगों का काम पहले ही पूरा हो चुका है। बांध परियोजना से तीन जिलों (पिथौरागढ़ के 87, चंपावत के 26 और अल्मोड़ा जिले के 21 गांव) के 134 ग्राम पंचायतों के लोग विस्थापित होंगे। डीएम सुरेंद्र नारायण पांडेय का कहना है कि चंपावत जिले के डूब क्षेत्रों में पेड़ों की गिनती पूरी होने के बाद आगे का काम किया जा सकेगा।
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