सुरक्षा के लिहाज से बेहद संवेदनशील भारत-नेपाल की बनबसा सीमा पर मानव तस्करी रोकने को प्रशासनिक और सामाजिक इकाइयां तो गठित हैं, लेकिन इन इकाइयों के पास साधन और संसाधनों का अभाव मानव तस्करी रोकने में बाधक बन रहा है। नतीजतन तस्कर गिरोह अनपढ़ और भोली-भाली नेपाली युवतियों एवं नाबालिग बच्चों को अपना शिकार बनाने में कामयाब हो रहे हैं। सीमा पर तैनात पुलिस के एंटी ह्यूमन ट्रेफिकिंग सेल का कार्यक्षेत्र तो काफी लंबा है, लेकिन स्टाफ काफी कम है। वहीं सरकारी योजना के तहत मानव तस्करी रोकने में अहम भूमिका निभा रही रीड्स संस्था के कार्यकर्ता चार साल से बगैर अनुदान के काम कर रहे हैं।
सीमा पार से मानव तस्करी रोकने को 28 जनवरी 2011 को तत्कालीन पुलिस महानिदेशक कंचन चौधरी भट्टाचार्य ने एंटी ह्यूमन ट्रेफिकिंग सेल का गठन किया था। इस सीमा पर पुलिस का यह सेल 2013 में अस्तित्व में आया। यहां तैनात एंटी ह्यूमन ट्रेफिकिंग सेल का कार्यक्षेत्र चंपावत जिले के साथ ही ऊधम सिंह नगर जिला भी है, लेकिन सेल की ढांचागत स्थित देखें तो सेल में एक इंस्पेक्टर, दो उप निरीक्षक, दो हेड कांस्टेबल और दो कांस्टेबलों के पद सृजित हैं। इसके सापेक्ष वर्तमान में एक उप निरीक्षक, दो हेड कांस्टेबल और दो कांस्टेबल ही तैनात है। आंकड़े बताते हैं कि मानव तस्करी में महिलाएं ज्यादा शिकार हो रही हैं, लेकिन सेल में एक भी महिला कांस्टेबल तैनात नहीं है।
हेड कांस्टेबल लक्ष्मण चंद देउपा एवं रवि चंद्र जोशी के मुताबिक महिला कांस्टेबल न होने से संदिग्ध प्रतीत होने वाली महिलाओं और युवतियों से पूछताछ के लिए स्वयंसेवी संस्था की महिला कार्यकर्ताओं की मदद लेनी पड़ती है। सीमा पर सेल की चौकी तो हैं, लेकिन आवाजाही करते संदिग्धों से पूछताछ के लिए मार्ग पर सेल का अपना चेकपोस्ट तक नहीं है। मजबूरन सेल के जवानों को बैराज पार रीड्स संस्था के चेकपोस्ट में बैठकर पूछताछ करनी पड़ती है।
इधर, सरकारी योजना के तहत मानव तस्करी रोकने में अहम भूमिका निभा रही रीड्स संस्था के कार्यकर्ता चार साल से कोई सरकारी अनुदान न मिलने के बावजूद पूरी निष्ठा से काम कर रहे हैं। संस्था के सचिव पंडित भुवन चंद्र गड़कोटी का कहना है कि संस्था को सरकार से हर साल अनुदान मिलता है, लेकिन वर्ष 2013 से संस्था को अनुदान नहीं मिल पाया है, इसके चलते संस्था को अब काम करने में कई प्रकार की दिक्कत होती है। उन्होंने बताया कि संस्था में 12 पूर्णकालिक और 6 अंशकालिक कार्यकर्ता कार्यरत हैं, लेकिन सरकार से अनुदान नहीं मिलने के कारण वे चार साल से बगैर मानदेय के काम कर रहे हैं।