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ओली की विदाई और देउबा के प्रधानमंत्री बनने से भारत-नेपाल संबंधों में सुधार की उम्मीद

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टनकपुर (चंपावत)। नेपाल में सियासी हलचल के बीच सदन में बहुमत हासिल करने के बाद प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा सदन के शेष बचे कार्यकाल (करीब डेढ़ साल) के लिए प्रधानमंत्री की कुर्सी पर काबिज हो गए हैं।
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उनके ताजपोशी से भारत-नेपाल संबंधों में पिछले कुछ समय से चली आ रही खटास कम होगी या नहीं, यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन प्रधानमंत्री रहते अपने पिछले कार्यकालों में देउबा ने भारत के साथ हमेशा दोस्ताना संबंध ही रखे।
नेपाल के वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक जानकारों का मानना है कि प्रधानमंत्री देउबा की कार्यशैली से दोनों देशों के रिश्तों में सुधार की उम्मीद बढ़ी है।
पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली का कार्यकाल भारत के साथ संबंधों के नजरिये से अनुकूल नहीं रहा। करीब साढ़े तीन साल के कार्यकाल में ओली सरकार की कूटनीतिक कार्यशैली भारत के साथ दूरी और चीन के साथ नजदीकी वाली रही।
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ओली सरकार ने नेपाल का नया मानचित्र जारी कर उसमें भारत के लिपुलेख और लिंपियाधुरा को नेपाल का हिस्सा दर्शाकर संबंध बिगाड़ने का ही काम किया।
कभी कोरोना तो कभी अयोध्या पर उल्टे-सीधे बयानों से ओली दोनों देशों के बीच विवाद की धुरी बने रहे। सदन में विश्वासमत हासिल कर नेपाली कांग्रेस के नेता शेर बहादुर देउबा अब विधिवत प्रधानमंत्री की कुर्सी पर काबिज हो गए हैं।
कुल 271 संख्या बल वाले सदन में उन्होंने 165 सदस्यों का विश्वास मत जीता है। उनके विपक्ष में 83 वोट पड़े। देउबा के प्रधानमंत्री बनने को भारत और नेपाल के बीच ओली कार्यकाल में बिगड़े रिश्तों में फिर सुधार की उम्मीद जगी है।
नेपाल के राष्ट्रीय दैनिक समाचार पत्र कांतिपुर के वरिष्ठ पत्रकार चित्रांग थापा का मानना है कि भारत के प्रति पूर्व प्रधानमंत्री ओली और नए प्रधानमंत्री देउबा का नजरिया अलग है। देउबा हमेशा भारत के साथ संबंध सुधारने के पक्षधर रहे हैं।
उनका मानना है कि संबंधों को और बेहतर करने के लिए भारत को भी पहल करनी होगी। काठमांडू में रहकर नेपाल की राजनीति पर नजर रखने वाले नेपाल पत्रकार महासंघ के पूर्व केंद्रीय सदस्य श्याम भट्ट का भी मानना है कि देउबा कार्यकाल में भारत के साथ संबंधों में सुधार और स्थिरता की उम्मीद की जा सकती है।
नेपाल गोरखा पत्र के पूर्व संपादक रहे युवराज गौतम भी यही मानते हैं। उनका कहना है कि भारत के साथ नेपाल के रोटी-बेटी, सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं से जुड़े रिश्तों को अलग नहीं किया जा सकता।
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