लोहाघाट (चंपावत)। भारत-नेपाल अंतरराष्ट्रीय सीमा पर बसे मडलक क्षेत्र के ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित हैं। आजादी के 78 वर्ष बाद भी इस सीमावर्ती क्षेत्र में आज तक एलोपैथिक अस्पताल नहीं खुल पाया है। इससे क्षेत्रवासियों को दवा और मामूली बीमारी के इलाज के लिए भी 15 किमी दूर पुल्ला, 30 किमी दूर लोहाघाट या फिर 45 किमी दूर चंपावत जिला मुख्यालय की दौड़ लगानी पड़ रही है।
स्वास्थ्य सेवाएं न होने से ग्रामीण यहां से पलायन के लिए मजबूर हैं। लोगों ने सीमावर्ती क्षेत्र में एक पीएचसी की स्थापना की मांग उठाई है, लेकिन उन्हें कोरे आश्वासन ही मिले। संवाद
नेपाल सीमा से लगे ये गांव हैं अस्पताल से महरूम
लेटी, सुंगरखाल, जमरसों, बगोटी, सल्टा, मजपीपल, मडलक, सागर, काकड़ी, बुंगा, सुनकुरी, सेल्ला, केलानी, बड़म, कंटुकरा, रजुवा, चामा, गुरेली, रौल-धीन, गुड़मागल।
गर्मियों में रहता है संक्रामक रोगों का खतरा
डुंगरालेटी, बगोटी, गुरेली, सुनकुरी आदि गांवों में गर्मियों में संक्रामक रोगों का खतरा भी काफी रहता है। इन रोगों से निपटने और बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के लिए यहां एक एलोपैथिक चिकित्सालय जरूरी है। लोगों का कहना है कि सरकार को ऐसे क्षेत्रों में अस्पताल की स्थापना के लिए मानकों में छूट देनी चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों के लिए मानक बदलने चाहिए। हालांकि मडलक क्षेत्र में एक आयुर्वेदिक अस्पताल है जहां लोग छुटपुट इलाज के लिए जाते हैं। संवाद
गर्भवतियों को होती सबसे अधिक दिक्कत
क्षेत्र में एलोपैथिक अस्पताल न होने से लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ता है। खासतौर पर गर्भवतियों को 30 किमी दूर लोहाघाट अस्पताल ले जाने को मजबूर होना पड़ता है। लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सेवा देने के लिए उचित कदम उठाने चाहिए। - दीपा देवी, ग्राम प्रधान बगोटी।
स्वास्थ्य सुविधाएं न होने से पलायन को मजबूर सीमावर्ती क्षेत्र के लोग
नेपाल सीमा से लगे गांवों में बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं न होने का खामियाजा ग्रामीणों को भुगतना पड़ता है। स्वास्थ्य सेवाएं न मिलने से संपन्न लोग गांवों से पलायन करते जा रहे हैं। अस्पताल खोलने के लिए लगातार आवाज उठती आ रही है, लेकिन सीमावर्ती क्षेत्र के लोगों की आवाज को अनसुना किया जा रहा है। - गणेश बोरा, ग्राम प्रधान मजपीपल
कोट
मडलक में एलोपैथिक अस्पताल खोलने के लिए पूर्व में प्रस्ताव स्वास्थ्य महानिदेशालय देहरादून को भेजा गया है। इसमें जनसंख्या, अस्पताल की दूरी, सड़क से दूरी, भूमि की उपलब्धता, भवन किराये में लेने की आवश्यकता है कि नहीं आदि बिंदुओं का उल्लेख किया गया है, लेकिन निदेशालय से अभी तक कोई दिशा निर्देश नहीं मिले हैं। दोबारा प्रस्ताव भेजा जा रहा है। - डॉ. देवेश चौहान, मुख्य चिकित्साधिकारी, चंपावत