चंपावत। शनिवार को हम आजादी की सालगिरह मनाएंगे। देश को आजाद करने में योगदान देने वाले सेनानियों को याद करेंगे। मगर इस जिले में एक ऐसे वीर योद्धा हैं, जिन्होंने 1857 के गदर में अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोला लेकिन उन्हें सरकार सेनानी नहीं मानती।
पहले स्वतंत्रता संग्राम (गदर) में भी इलाके ने शिरकत की। मगर गदर में बहादुरी दिखाने वाले कालू सिंह माहरा को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का दर्जा नहीं मिला है। और इसकी वजह है आजादी की जंग से संबंधित दस्तावेजों का आग लगने से नष्ट होना।
प्रदेश शासन ने 2015 में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी नियमावली और सेनानी से संबंधित कोई साक्ष्य नहीं मिलने को आधार बनाते हुए स्वर्गीय कालू माहरा को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी घोषित किए जाने से इंकार कर दिया था। वहीं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी उत्तराधिकारी संगठन जिलाध्यक्ष महेश चौड़ाकोटी का कहना है कि कालू माहरा ने पहाड़ में आजादी की लड़ाई का आगाज किया था। उनकी ही प्रेरणा से क्षेत्र में बाद में आजादी की जंग में और लोग कूदे थे।
ये था कालू माहरा का आजादी में योगदान
कुमाऊं का स्वाधीनता संग्राम में योगदान पत्रिका के मुताबिक काली कुमाऊं में गदर में शिरकत के लिए कालू माहरा के नेतृत्व में एकत्र हुए चौड़ापिता के बोरा, रैघों के बैड़वाल, रौलमेल के लडवाल, चकोट के क्वाल, धौनी-मौनी, करायत, देव, बोरा और फर्त्याल लोगों ने लोहाघाट में अंग्रेजों की बैरक में आग लगाकर उन्हें भगा दिया। कमिश्रर रैमजे ने टनकपुर और लोहाघाट से सैनिकों की टुकड़ी भेज इन आंदोलनकारियों को रोका। बस्टिया में कालू माहरा ने अंग्रेजों का जमकर मुकाबला किया। लेकिन उन्हें पीछे हटना पड़ा। कूर्मांचल केसरी बद्रीदत्त पांडेय ने भी कुमाऊं के इतिहास में लिखा है कि कालू माहरा को कई जेलों में रखा गया। इसी दौरान दो अन्य क्रांतिकारियों आनंद सिंह फर्त्याल और बिशन सिंह करायत को अंग्रेजों ने गोली से उड़ा दिया। लेकिन इनमें से किसी को भी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का दर्जा नहीं मिला है।
तो क्यों होते रहे माहरा के नाम पर कार्यक्रम
चंपावत जिले में कालू सिंह माहरा के नाम पर कई कार्यक्रम आयोजित किए जा चुके हैं। सेनानी परिवार से जुड़े खेतीखान निवासी देवेंद्र ओली बताते हैं कि आजादी के 50 साल पूरे होने पर 1997 में खेतीखान में कार्यक्रम हुआ। 2004 में केएमवीएन के तत्कालीन अध्यक्ष डॉ. पीएस बिष्ट, इतिहासकार पद्यमश्री डॉ. शेखर पाठक सहित कई दिग्गजों की मौजूदगी में कालू माहरा व्याख्यानमाला हुई। 2007 को कालू के पैतृक आवास से पावन माटी कार्यक्रम हुआ। 2010 में तत्कालीन डीएम की मौजूदगी में कालू के नाम पर लोहाघाट चौराहे का नाम रखने के अलावा उनकी प्रतिमा भी लगाई गई। अगर वे सेनानी नहीं थे, तो ये तमाम कार्यक्रम क्यों और किस हैसियत से कराए जाते रहे। ये सवाल सेनानी के प्रपौत्र उठाते हैं।
कोट
सेनानी कालू माहरा के तमाम दस्तावेज थुवामहरा स्थित घर में आग लगने से जल गए। बाद में उन्होंने परदादा जी को सेनानी का दर्जा दिलाने के लिए आवाज भी उठाई। लेकिन शासन साक्ष्य मांग रहा है। जबकि आग लगने के बाद साक्ष्य कहां से आएंगे? अब इस मसले को फिर से प्रशासन व सेनानी संगठन के सम्मुख उठाया जाएगा।
बृजेश माहरा,
प्रपौत्र, सेनानी कालू माहरा।
कोट
कालू माहरा समूचे कुमाऊं की अनमोल धरोहर हैं। आजादी की लड़ाई में सबसे शुरुआती योद्धाओं में वे शुमार थे। तकनीकी वजहों से उन्हें सेनानी नहीं माने जाने के मामले को विधानसभा में उठाया जाएगा।
पूरन सिंह फर्त्याल, विधायक, लोहाघाट।