अपराजिता 100 मिलियन स्माइल्स के तहत राज्य स्थापना दिवस की पूर्व संध्या पर 8 नवंबर को हमारे सपनों का उत्तराखंड विषय पर हुई गोष्ठी में युवाओं ने राज्य की मौजूदा स्थिति में सुधार पर जोर दिया। इस दौरान वक्ताओं ने कहा कि अलग राज्य बनने का मकसद पूरा नहीं हो पाया है।
शनिवार को जिला पुस्तकालय सभागार में पुस्तकालय प्रभारी डॉ. वीरेंद्र मेहता के संचालन में हुए कार्यक्रम में युवाओं ने राज्य की खूबियों के साथ खामियों को भी बेबाकी से रखा। इससे पूर्व खंड शिक्षाधिकारी अंशुल बिष्ट ने युवाओं को शपथ दिलाते हुए महिला सशक्तीकरण के लिए सामूहिक सहभागिता पर जोर दिया।
राज्य आंदोलनकारी मंदीप ढेक सहित कई वक्ताओं ने कहा कि उत्तर प्रदेश से अलग होकर बने उत्तराखंड राज्य का असल मकसद 19 साल बाद भी पूरा नहीं हो सका है। यद्यपि कुछ काम हुए है, लेकिन कई काम होना बाकी हैं।
रोजगार से लेकर स्थायी राजधानी तक के मसले अब भी अनुत्तरित हैं। बुनियादी जरूरतों से लेकर विकास योजनाओं की प्राथमिकता में धन के सदुपयोग की जरूरत है। शिक्षा, सेहत, साफ पानी, उद्योग, सिंचाई, यातायात सुविधा अब भी लोगों से दूर है। वहीं छोटे राज्य से लोगों की सरकार और नेताओं से पकड़ आसान हुई है।
उत्तराखंड की नींव रोजगार को लेकर रखी गई थी लेकिन रोजगार के अवसर कम होने से इस वक्त सबसे बड़ी चुनौती बेरोजगारों को योग्यता अनुरूप काम देने की है। सिद्धार्थ सिंह, छात्र
-पहाड़ी राज्य में आबोहवा तो अच्छी है लेकिन सेहत की स्थिति डरावनी है। सरकारी अस्पताल इलाज लायक नहीं और निजी अस्पताल में खर्च करना हर किसी के वश में नहीं है। लता जोशी, छात्रा
-नए स्कूल, नए अस्पतालों की तादाद तो खूब बढ़ रही है लेकिन इनकी गुणवत्ता पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। जरूरत इस तस्वीर को बदलने की है। पूजा ओली, छात्रा
-मां पूर्णागिरि धाम, मां बाराही धाम, मायावती अद्वैत आश्रम, एबट माउंट सहित कई पर्यटन स्थल हैं लेकिन सैलानियों को लुभाने के लिए जरूरी आधारभूत ढांचा तैयार नहीं हो सका है। मनोज जोशी, छात्र
गोष्ठी में इन लोगों ने भी हिस्सा लिया:
प्रेमा बोहरा, अक्षय सक्टा, विमला तिवारी, हेमा पांडेय, राहुल तड़ागी, विनीता पांडेय, पूजा पांडेय, बलराज सिंह, ललित मोहन जोशी और बसंत चतुर्वेदी।