चंपावत जिला अस्पताल में इलाज कराने आईं महिलाएं।
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जिले की 259648 की आबादी में 49.39 प्रतिशत (128253) महिलाएं हैं लेकिन इस आधी आबादी की सेहत को लेकर कोई चिंता नहीं है। सियासी नेता सेहत को सुधारने के कई दावे कर चुके हैं लेकिन अस्पतालों की हकीकत इन दावों को हवाई बताती है। नेपाल सीमा से लगे चंपावत जिले के किसी भी सरकारी अस्पताल में गर्भवती महिलाओं के इलाज के लिए एक भी गायनाकोलोजिस्ट (वरिष्ठ स्त्री रोग विशेषज्ञ) नहीं है।
जिला अस्पताल सहित जिले के तमाम अस्पतालों में आने वाली औसतन प्रति माह 11304 ओपीडी में से 3733 महिलाओं से संबंधित मामले आते हैं लेकिन इन महिलाओं के इलाज की कारगर व्यवस्था नहीं है। जिले के छोटे-बड़े 23 सरकारी अस्पतालों को छोड़िए, सबसे बड़ा स्वास्थ्य केंद्र जिला अस्पताल भी गायनाकोलोजिस्ट से वंचित है। जिला अस्पताल में 23 जुलाई 2018 से गायनाकोलोजिस्ट की कुर्सी खाली है। जिले में एक गायनाकोलोजिस्ट और पांच स्त्री रोग विशेषज्ञ (एलएमओ) के पद हैं लेकिन इकलौती एलएमओ की तैनाती है।
स्वास्थ्य महानिदेशक ने 8 अगस्त को जिला अस्पताल में एक गायनाकोलोजिस्ट के स्थानांतरण आदेश किए लेकिन अब तक उन्होंने ज्वाइन नहीं किया है। विशेषज्ञ नहीं होने से गर्भवती महिलाओं के इलाज से लेकर जटिल प्रसव में समस्या आ रही है। शनिवार को अस्पताल आईं कमला, सरोज आदि का कहना है कि समुचित इलाज न मिलने से उन्हें निजी अस्पताल जाने को मजबूर होना पड़ रहा है।
और तो और 2018 से अब तक आठ गर्भवती महिलाओं और प्रसूताओं की मौत भी हो चुकी है। सीएमओ डॉ. आरपी खंडूरी का कहना है कि गायनोकोलाजिस्ट और तीन एलएमओ की तैनाती के लिए निदेशालय से आग्रह किया गया है।
13 महीने से गायनाकोलोजिस्ट नहीं होने से गर्भवती महिलाओं से संबंधित रोगों के इलाज और जटिल प्रसव में दिक्कत आ रही है। वे नियमित रूप से गायनाकोलोजिस्ट के लिए उच्चाधिकारियों को पत्र भेज रहे हैं लेकिन अभी तक तैनाती नहीं हो सकी है। इस कारण जटिल मामलों को हायर सेंटर भेजना पड़ता है। डॉ. आरके जोशी, मुख्य चिकित्साधीक्षक, जिला अस्पताल
जिला अस्पताल के सीएमएस डॉ.आरके जोशी।- फोटो : CHAMPAWAT