चंपावत। सोमवार को 11:25 बजे तक यह तय नहीं था कि देवीधुरा की देश-दुनिया में मशहूर बगवाल इस बार होगी या नहीं ? मगर सार्वजनिक रूप से बगवाल नहीं खेलने के एलान के बावजूद बगवाल की परंपरा का निर्वहन किया गया। देवीधुरा मंदिर समिति का कहना है कि कम लोगों के साथ बगवाल का सांकेतिक आयोजन करके न केवल कोविड-19 की गाइडलाइन का पालन किया गया, बल्कि परंपरा भी निभाई गई। भीड़ न हो, इसके लिए मंदिर समिति ने बगवाल होने की बात को सार्वजनिक नहीं होने दिया। इस मामले में पूरी गोपनीयता बरती गई।
धार्मिक परंपरा और जगत कल्याण के लिए सदियों से चल रही बगवाल को लेकर भले ही प्रशासन और मंदिर समिति ने जो भी निर्णय लिया हो, लेकिन इसे लेकर मंदिर समिति और चारों खामों में रविवार शाम तक जबर्दस्त उहापोह रहा। बताया जाता है कि प्रशासन के साथ रविवार को हुई बैठक के बाद समिति और चारों खामों के प्रतिनिधियों ने गहन मंत्रणा की। भारी माथापच्ची के बाद गोपनीय रूप से तय किया गया कि बगवाल को नागा करना इस परंपरा को खंडित करना होगा। इससे बचने के लिए सभी खामों के 11-11 लोग बगवाल में शिरकत करेंगे। कोविड-19 के खतरे से बचने के लिए सोशल डिस्टेंसिंग के पालन के अलावा मास्क और सैनिटाइजर का भी पूरा उपयोग किया जाएगा।
कोट....
बगवाल करने या न करने को लेकर धर्म, परंपरा व कोविड-19 के पहलु पर गहन विचार किया गया। सभी की राय थी कि बगवाल को नागा करना ठीक नहीं होगा। अलबत्ता इसे लेकर पूरी तरह गोपनीयता बरती गई। मंदिर कमेटी बगवाल होने की बात को पहले सार्वजनिक करती, तो भारी भीड़ हो जाती, जिससे कोविड-19 को लेकर बरती जाने वाली सावधानियां नहीं हो पाती। इस तरह बगवाली वीरों और समिति ने कोविड-19 से बचाव का ध्यान रखते हुए परंपरा को भी बचाया है। साथ ही क्षेत्र के लोगों को भी मंदिर परिसर न आने को समझाया गया।
पंडित कीर्ति बल्लभ जोशी,
पीठाचार्य, मां बाराही मंदिर,
बगवाल का होना आदेशों के उल्लंघन के साथ कोरोना काल के दिशा-निर्देशों की भी अवमानना है। मंदिर समिति ने प्रशासन से जो वादा किया था, उसे तोड़ा है। मौके पर मौजूद अधिकारियों की रिपोर्ट के बाद अगला कदम उठाया जाएगा।
सुरेंद्र नारायण पांडेय,
डीएम, चंपावत।