माल्टा और गलगल (बड़ा नींबू) की न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) खरीद की सरकारी योजना धड़ाम हो गई है। 48 दिनों की खरीद अवधि में चंपावत जिले में 48 क्विंटल सिटरस फल तो दूर, छह क्विंटल फल भी नहीं खरीदा जा सका। यानि रोजाना औसतन 11.83 किलो की खरीद हुई। तीन में से दो बिक्री केंद्रों में तो बौनी तक नहीं हुई। उद्यान विभाग के लोहाघाट और देवीधुरा के बिक्री केंद्रों में एक किलो सिटरस फल की भी नहीं खरीद नहीं हो सकी।
जिले में 48 दिनों की निर्धारित खरीद अवधि (15 दिसंबर से 31 जनवरी तक) में मात्र 5.68 क्विंटल खरीद हुई। माल्टा 4.58 क्विंटल और गलगल 1.10 क्विंटल ही बिक्री केंद्रों में लाया गया। ये सभी खरीद एकमात्र चंपावत केंद्र में हुई। ए ग्रेड (85 मिमी ब्यास) के माल्टा का एक भी दाना नहीं आया, जबकि बी ग्रेड (70 एमएम ब्यास) में 33 किलो और सी ग्रेड (70 एमएम से कम) में सबसे ज्यादा 425 किलो माल्टा एकत्र हुआ।
वहीं, कुल 1.10 क्विंटल गलगल की खरीद हो सकी। गलगल में ए ग्रेड (90 मिमी ब्यास) में 41 किलो, बी (75 एमएम) ग्रेड में 40 किलो और सी ग्रेड (75 एमएम से कम ब्यास) में 29 किलो खरीद ही उद्यान विभाग कर सका। ये तमाम बिक्री मात्र पांच उत्पादकों द्वारा की गई है। इन तमाम उत्पादकों को कुल मिलाकर 3913 रुपये दे दिया गया।
माल्टा के ए ग्रेड को 1600 रुपये, बी ग्रेड को 1300 रुपये और सी ग्रेड को 700 रुपये प्रति क्विंटल की न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) निर्धारित की थी। इसी तरह गलगल के तीनों ग्रेडों के समर्थन मूल्य क्रमश: 800, 600 और 400 रुपये प्रति क्विंटल घोषित किया गया था।
माल्टा और गलगल की न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद बेहद कम रही। फल उत्पादकों को ये योजना नहीं लुभाने की कई वजहें रही। आमतौर पर फलों का साइज तय मानकों से कम होने से किसानों को रेट कम मिल रहे थे। बहरहाल एकत्र फलों का विभाग के प्रसंस्करण केंद्र में जूस बनाया जा रहा है। अलबत्ता अगली बार बिक्री के साथ ही अधिक बेहतर श्रेणी के उत्पादन के लिए किसानों को प्रेरित करेंगे। -एचसी तिवारी, जिला उद्यान अधिकारी
सिटरस फल एरिया (हेक्टेयर) उत्पादन (एमटी)
माल्टा 1025 2110
गलगल 406 1041
संतरा 535 920
कागजी नींबू 260 380
रोड से फासला बना ब्रेकर
जिले में तल्लादेश, गुमदेश सहित कई इलाके सिटरस फल के प्रमुख उत्पादक क्षेत्र हैं, मगर यहां के एक भी किसान ने माल्टा और गलगल की बिक्री उद्यान विभाग को नहीं की। किसान हरीश चंद्र पांडेय, लीलाधर, केसर सिंह, डूंगर देव का कहना है कि माल्टा और गलगल का साइज आमतौर पर बहुत बड़ा नहीं है। सड़क से दूरी इन इलाकों के लोगों को बिक्री केंद्रों तक फलों को पहुंचाने के लिए बहुत मुनाफे का सौदा नहीं है। कई फल कारोबारी इन गांवों तक खुद पहुंचकर सरकारी खरीद से बेहतर कीमतें देते हैं। ये कीमत 25 रुपये किलो तक मिल रही, जबकि सरकारी खरीद में अधिकतम कीमत मात्र 16 रुपये किलो था। किसानों का कहना है कि सरकारी खरीद में भुगतान में भी देरी होती है। इन कारणों से सरकारी केंद्रों की ओर उत्पादकों का रुख कम रहा।