जननी सुरक्षा योजना के जरिए मातृत्व को सहज और सुरक्षित बनाने के दावे चाहे जितने भी हो, लेकिन चंपावत जिले के दूरस्थ गांवों में ये हकीकत नहीं है। रोड से 25 किलोमीटर पैदल दूरी नदी-नालों को पार करते दर्द से कराहती डांडा गांव की गर्भवती महिला को अस्पताल तक लाने के लिए ग्रामीणों के कंधों का आसरा न मिला होता, तो यह महिला न बेटी को जन्म दे पाती और न बच पाती।
डांडा के कैलाश सिंह की पत्नी खीमा देवी (23) गर्भवती थी। 19 जून से उसकी हालत बिगड़ने लगी। 22 जून को ग्रामीणों ने खीमा देवी को कंधों के सहारे 25 किमी पैदल दूरी लांघ रोड हैड पर कलोनियां पहुंचाया। सामाजिक कार्यकर्ता प्रेम सिंह बोहरा ने बताया कि टाट-कट्टों और लकड़ी के सहारे कामचलाऊ डोली बनाई और चार लोगों ने बारी-बारी से पांच घंटे से अधिक समय में खीमा को कलोनियां पहुंचाया। सुबह आठ बजे से चल इस पैदल सफर को दिन में एक बजे बाद पूरा किया जा सका। कलोनियां से मोहन गड़कोटी के शक्तिमान ट्रक के सहारे महिला को करीब 3.30 बजे टनकपुर अस्पताल ले जाया गया। पर अस्पताल पहुंचने पर डॉक्टरों ने महिला को रेफर कर दिया। सीएमएस डा.एचएस ह्यांकी ने बताया कि गर्भवती को मात्र एक टीका लगा था। साथ ही महिला की कमजोर सेहत की वजह से उन्हें रेफर करना पड़ा।
गरीबी के कारण खीमा के परिजन आगे ले जाने में सक्षम नहीं थे। लिहाजा टनकपुर के ही एक निजी अस्पताल में महिला को भर्ती कराया गया। जहां 22 जून की रात उन्होंने एक बेटी को जन्म दिया। शुक्रवार को खीमा देवी को वापस डांडा गांव लाया गया। गांव के प्रताप सिंह, मोहन सिंह, कुंदन सिंह, ग्राम प्रहरी रमेश राम, बसंती देवी, नंदी देवी सहित 35 लोगों ने डोली के सहारे अस्पताल पहुंचाया और वापस घर पहुंचाया। इस दौरान चार जगह पर सरारा नदी और नालों को लांघना पड़ा।
बंद रहता है डांडा स्वास्थ्य उपकेंद्र
डांडा गांव में बाकायदा स्वास्थ्य उप केंद्र है। इस केंद्र के अधिकांश हिस्से का उपयोग पुलिस चौकी के रूप में हो रहा है। दो कमरों में से एक दवा वितरण और दूसरा प्रसूति गृह के रूप में काम में आता है। मगर यह स्वास्थ्य उपकेंद्र अक्सर बंद रहता है। ग्रामीणों का कहना है कि एएनएम की तैनाती नहीं होने से यहां के शिशु और गर्भवती टीकाकरण से अमूमन वंचित रहती हैं। और फार्मेसिस्ट महीनों से यहां है नहीं। फार्मेसिस्ट दिलीप सिंह से संपर्क नहीं होने से उनका पक्ष नहीं जाना जा सका। वहीं आशा कार्यकर्ती की भी यहां तैनाती नहीं हुई है। उधर प्रभारी सीएमओ डा.रश्मि पंत का कहना है कि डांडा में शिविर लगाकर हर माह टीकाकरण कराया जा रहा है।
मानवाधिकार आयोग से शिकायत करेंगी प्रधान
डांडा की ग्राम प्रधान खीमा बोहरा का कहना है कि यहां के स्वास्थ्य उप केंद्र की हालत ठीक नहीं है। इस केंद्र के फार्मेसिस्ट की तीन महीने से कुंभ ड्यूटी लगी थी। 22 जून को भी फार्मेसिस्ट नदारद थे। इस इलाके की बदतर स्वास्थ्य सेवा तथा काम में लापरवाही की शिकायत स्वास्थ्य विभाग, राज्य मानवाधिकार आयोग और महिला आयोग से की जाएगी।
जननी सुरक्षा योजना में मिलती है ये सुविधाएं
चंपावत। जननी सुरक्षा योजना के अंतर्गत महिला को गर्भवती होने के बाद से शिशु के जन्म तक तमाम सुविधाएं मिलती हैं। प्रसव से पूर्व गर्भवती की देखभाल (एएमसी) को बाकायदा कार्ड बनाया जाता है। गर्भवती होने की पुष्टि और तीन माह बाद टिटनेस का टीका लगाया जाता है। ब्लड प्रेशर, वजन, हीमोग्लोबीन और प्रोटीन की मात्रा का परीक्षण होता है। गर्भ के 12 हफ्ते, 20 हफ्ते, 27 हफ्ते और 32 हफ्ते बाद महिला की नियमित जांच होती हैं। लेकिन खीमा देवी सहित डांडा की महिलाएं इन तमाम सुविधाओं से वंचित हैं। योजना के तहत शिशु जन्म के बाद ग्रामीण क्षेत्र की प्रसूता को 1400 रुपये भी दिए जाते हैं।