देवीधुरा के बग्वाल मेले का स्वरूप भले ही साल-दर-साल बदलता जा रहा है, लेकिन बग्वाल और मेले की कई पुरातन परंपराएं अब भी लोगों के जेहन में हैं। अतीत में देवीधुरा में जनेऊ पून्यू (पूर्णिमा) का आयोजन किया जाता था। पहाड़ का सबसे पवित्र त्यौहार माने जाने वाले जनेऊ पूर्णिमा का आयोजन देवीधुरा में कब रक्षा पून्यू के रूप में तब्दील हो गया कहा नहीं जा सकता है।
रक्षा पून्यू में पुरोहित अपने यजमानों को रक्षा सूत्र बांधते थे। इतिहासकार देवेंद्र ओली के अनुसार पांच दशक पहले तक बग्वाली मेले को जनेऊ पून्यू का मेला कहा जाता था। तब यातायात की सुविधा और साधन नहीं होने के कारण बग्वाल मेले में शामिल होने के लिए दूरस्थ क्षेत्र के लोगों को काफी पहले से ही तैयारी करनी पड़ती थी। मेले के दौरान मंदिर परिसर में ठहरने वाले श्रद्धालुओं के मनोरंजन के लिए स्थानीय लोक कलाकारों की ओर से रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाते थे। कमोवेश यही परंपरा आज भी है।
कभी द्यौ धूरा के नाम से प्रसिद्ध था देवीधुरा
वर्तमान में मां बाराही धाम देवीधुरा कभी द्यौ धूरा के नाम से प्रसिद्ध था। रंगकर्मी राजेंद्र गहतोड़ी के अनुसार बाराही धाम के काफी ऊंचाई में स्थित होने और यहां पर चारों ओर बांज के सघन वन होने के कारण अधिकांश समय बरसात सा नजारा रहता था। जिस कारण ही इसे द्यौ (बादल) धूरा कहा जाता था। इसके बाद द्यौ धूरा का नाम अपभ्रंश होते होते देधूरा हो गया, जो वर्तमान में देवीधुरा हो गया है।
तंत्र साधना के लिए भी मशहूर है शक्तिपीठ
देवीधुरा के बाराहीदेवी शक्तिपीठ की मान्यता तंत्र साधना के प्रमुख शक्तिपीठों में होती है। पंडित बसंत बल्लभ बताते हैं कि तंत्र साधना के लिए जरूरी बगुलामुखी मंत्र की साधना केवल देवी शक्तिपीठों में ही की जा सकती है। अतीत में यहां की गुफाओं में साधकों के लंबे समय तक तपस्या और साधना किए जाने के प्रमाण भी मिलते हैं।