पीपीपी मोड संचालित अस्पताल में बुधवार को गर्भस्थ शिशु की मौत होने पर बवाल हो गया। अस्पताल की अव्यवस्था के चलते हुई इस मौत से गुस्साए लोगों ने लगभग छह घंटे तक हंगामा करने के साथ ही बच्चे के शव नहीं उठाया। बाद में सीएमओ के मौके पर पहुंचने और जांच समिति गठित किए जाने की घोषणा के बाद लोग कुछ शांत हुए।
प्राप्त जानकारी के अनुसार बसान गांव की हेमा (24) पत्नी मोहन सिंह को प्रसव के लिए चार जनवरी को अस्पताल में भर्ती किया गया। डॉक्टरों ने सबकुछ ठीक-ठाक होने की बात कहकर दूसरे दिन आने के लिए कहा। पांच जनवरी को भी दूसरे दिन आने की बात कही गई। बुधवार सुबह हेमा को प्रसव पीड़ा होने पर सुबह छह बजे जब अस्पताल में भर्ती किया गया तो यहां कोई महिला डॉक्टर नहीं थी। स्टाफ नर्स ने ही प्रसव कराया, जिसमें मरा हुआ बच्चा निकाला गया। स्टाफ नर्स ने महिला डॉक्टर को इसकी जानकारी तक नहीं दी।
वहीं, बच्चे की मौत की खबर सुनने पर तीलू रौतेली पुरस्कार प्राप्त रीता गहतोड़ी अस्पताल में पहुंची। उन्होंने इसकी सूचना पुलिस तथा प्रशासनिक अधिकारियों के अलावा जन प्रतिनिधियों को दी। इस पर गोविंद वर्मा, गोविंद बोहरा समेत तमाम लोग अस्पताल पहुंचे। इसी दौरान विधायक पूरन फर्त्याल भी आ गए। सभी ने इस लापरवाही के लिए प्रबंधन को जिम्मेदार बताया। अस्पताल में भीड़ बढ़ती गई। एसआई मीनाक्षी नौटियाल, एसआई प्रेम विश्वकर्मा दल-बल के साथ मौके में पहुंच गए। लोगों ने देर तक सीएमएस और यूनिट हैड का घेराव किया। इसी दौरान सीएमओ डा.विनोद टोलिया भी पहुंच गए। उन्हें भी जन रोष का सामना करना पड़ा।
हेमा के पति की शिकायत के आधार पर सीएमओ ने डिप्टी सीएमओ डा.रश्मि पंत के नेतृत्व में डा.आरपी खंडूरी, डा.मेघा गुप्ता, डा.उदयशंकर की जांच टीम गठित कर दी है, जो सोमवार से जांच शुरू कर तीन दिन के भीतर अपनी रिपोर्ट देगी। उधर, विधायक फर्त्याल का कहना था कि अस्पताल की अव्यवस्थाओं को लेकर वे चार बार विधानसभा में यह मामला उठा चुके हैं, लेकिन यहां अकाल मौतों का सिलसिला जारी है।
गूंजने से पहले ही शांत हो गई किलकारी
बसान गांव की हेमा के घर में बच्चे की किलकारी गूंजने से पहले ही शांत हो गई। हेमा की पहली बेटी है। दूसरे प्रसव को लेकर घर के लोग नए मेहमान के आने का इंतजार कर रहे थे। अस्पताल की लापरवाही से बच्चा पेट में ही मरने से वह एवं उसका परिवार काफी सदमे में है।
प्रसव के दौरान हो चुकी हैं 58 बच्चों की मौत
अस्पताल को पीपीपी मोड में सौंपने के बाद यहां 25 अक्तूबर 2013 से छह जनवरी 2016 तक 2342 प्रसव किए गए हैं, जिसमें 58 बच्चों की मौत हो चुकी है। आज का यह मामला रीता गहतोड़ी के हस्तक्षेप के बाद उजागर हुआ, जबकि इससे पहले भी लापरवाही से कई मौतें हुई हैं। छह नवंबर 2014 को बीडीसी सदस्य निर्मला पंगरिया की भी लापरवाही से मौत हुई थी। 27 अप्रैल को मीनाबाजार के राजेश कुमार की पत्नी ममता ने गर्भ में मरे बच्चे को जन्म दिया, जबकि डॉक्टर ने बच्चे को अंतिम समय तक सही बताया था। दिगालीचौड़ की एक गर्भवती को सही सलामत बताया गया था, लेकिन उसने जुड़वा बच्चों को जन्म दिया, जिनकी बाद में मृत्यु हो गई।
सादे कागज में कराए हस्ताक्षर
अस्पताल प्रबंधन ने अपनी लापरवाही को छुपाने के लिए बच्चे की मौत के बाद हेमा से सादे कागज में हस्ताक्षर कराए गए हैं, जिसमें बाद में लिखा गया है कि बच्चे और उसे यदि कुछ हो गया तो उसके लिए वह स्वयं जिम्मेदार रहेगी। उसके पति का कहना है कि यह लिखत-पढ़त हंगामे को देखते हुए किया गया। छह जनवरी को हस्ताक्षर कराए गए, लेकिन उसमें लिखत-पढ़त पांच जनवरी की दिखाई गई है।
यूनिट हैड ने स्वीकारी लापरवाही
यूनिट हैड रवि सिन्हा ने अस्पताल की लापरवाही से ही बच्चे की मौत होना स्वीकार किया है। सीएमओ का कहना है कि वस्तुस्थिति डॉक्टरों की जांच के बाद सामने आएगी। अलबत्ता यह कहा जा सकता है कि स्टाफ नर्स को महिला की गंभीर स्थिति को देखते हुए महिला डॉक्टर को सूचना देकर उसे बुलाना चाहिए था।