सोमवार को मां पूर्णागिरि धाम में नया इतिहास रचा जाएगा। मुख्यमंत्री हरीश रावत मां के धाम के लिए 35 करोड़ लागत के रोपवे (रज्जुमार्ग) का शिलान्यास करेंगे। मगर जिले के तीन ऐसे रोपवे हैं, जो बनने के तीन माह बाद किसी काम के नहीं रह गए। इन रोपवे से रोड से कटे गांवों की माली हालत सुधरती।
अब लोग पूछ रहे है कि सीएम साहब आपने किसान पेंशन योजना तो चलाई, लेकिन क्या किसानों की जिंदगी को संवारने वाले ये रोपवे दोबारा चलेंगे?
सिप्टी घाटी से लगे करीब 20 गांव फल उत्पादन में आगे हैं, लेकिन इन ग्रामीणों की उपज को सड़क मार्ग तक पहुंचाने के मकसद से 2006 में सम विकास योजना से तीन स्थानों में रोपवे का निर्माण हुआ। सैंदर्क और अमकड़िया गांवों के बीच सात लाख रुपये से 900 मीटर लंबा रोपवे बनाया गया। वहीं छह लाख रुपये में सिमाड़ से पुनाबे, दियूरी बैंड से मटेला तक रोपवे का निर्माण हुआ। इन रोपवे में 90 किलो क्षमता तक की सामग्री लाई जा सकती थी। मगर करीब तीन महीने बाद ही ये रोपवे जवाब दे गए। रोपवे ने काम करना बंद कर दिया। रोपवे में ट्राली टूटने, तार की खामी के अलावा जनरेटर भी खराब है।
ग्राम पंचायत इसे ठीक करने में धन की कमी की बात कहती है। पूर्व ग्राम प्रधान खीमा भट्ट का कहना है कि रोपवे की खामियों को दूर करने के लिए कई बार उद्यान विभाग से आग्रह किया गया था, लेकिन उसने हाथ खड़े कर दिए। लोगों को फसल का वाजिब दाम नहीं मिल पा रहा है।
रोपवे का कुछ भी लाभ नहीं
चंपावत। अमकड़िया, मारामट्टा, बुड़ाखेत, भंतोला, गवाड़, सिमाड़ सहित यहां के ज्यादातर गांवों में रोड नहीं हैं, लेकिन ये गांव खूब उपजाऊ हैं। इन गांवों में आम, पपीता, केला, अमरूद, संतरा सहित फलों का खूब उत्पादन होता है। पर रोपवे बनने के बाद भी सड़क से कटे इन गांवों को कुछ भी लाभ नहीं हुआ। अर्द्ध विधिक स्वैच्छिक स्वयंसेवक (पीएलवी) प्रकाश जोशी, राजेंद्र राम का कहना है कि खच्चर से ढुलान में प्रति क्विंटल 300 से 400 रुपये लगता है, जबकि रोपवे से ये लागत महज 30 से 50 रुपये आती। ग्रामीणों की मेहनत उपज को सड़क तक पहुंचाने में लग जाती है फिर भी उत्पाद की कीमत नहीं मिल पाती है। ऐसे में रोपवे द्वारा जगाई आस इनके काम नहीं करने से उनकी उम्मीदों पर पानी फेर रही है।