चंपावत जिले में करीब एक-तिहाई नहरें बंद हैं। बंद नहरों को शुरू करना भी चुनौती बन रहा है। 95 नहरों में से 32 नहरें बद हो गई है। 1115 हेक्टेयर जमीन की सिंचाई के बजाय महज 733 हेक्टेयर एरिया में ही सिंचाई हो पा रही है।
पहाड़ में किसान मुख्य रूप से बारिश पर आश्रित हैं, लेकिन समय पर बारिश नहीं होने से उनकी मेहनत पर पानी फिर रहा है। वैसे भी ढेरों नहरें बंद हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में सिंचाई साधनों की कमी से किसानों को दिक्कत झेलनी पड़ती है। करीब 27 हजार हेक्टेयर खेती योग्य जमीन में सिंचाई व लघु सिंचाई विभाग की नहर और गूलों से बमुश्किल 15 प्रतिशत में ही सिंचाई की सुविधा है।
जिले में 281 किमी लंबी 95 नहरों का निर्माण किया गया है। इन नहरों से 1115 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई होती थी। लेकिन इस वक्त 63 नहरें ही चालू हाल में है। जिनमें से स्रोत में पानी की कमी के चलते 18 नहरें सूखने की कगार में हैं जबकि 14 नहरें पूरी तरह से ठप हो चुकी है। लोहाघाट, पाटी और बाराकोट क्षेत्र में निर्मित 44 नहरों में से 29 नहरें चालू हैं। इन नहरों से 661 लाभार्थियों द्वारा 259 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई की जाती है। इसी प्रकार चंपावत, टनकपुर में निर्मित 51 नहरों में से 34 ही चालू हैं। इससे 856 हेक्टेयर खेतों की सिंचाई होती है।
किसानों का कहना है कि सिंचाई की कमी उनकी पैदावार को प्रभावित कर उनकी आर्थिक प्रगति पर अवरोध बन रही है। लोहाघाट सिंचाई विभाग के अधिशासी अभियंता अवधेश राम का कहना है कि बंद पड़ी नहरों को चालू करने के लिए प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना से बजट की मांग की गई है। बजट आते ही बंद पड़ी नहरों को चालू करने का प्रयास किया जाएगा।