चंपावत।
जिले के हजारों किसानों के लिए कर्ज चुकाना दिन-प्रतिदिन कठिन हो रहा है। सहकारिता वर्ष (जुलाई से जून तक) के पहले 11 महीने बीत चुके हैं, लेकिन आधे से ज्यादा कर्ज की वसूली अब भी बाकी है। पहले 11 महीनों में महज 47 प्रतिशत कर्ज चुकाया जा सका है, जबकि इस अवधि में पिछले साल 66 प्रतिशत कर्ज की वसूली हुई थी।
चंपावत जिले की 23 साधन सहकारी समितियों के 28,508 सदस्यों में से 4678 किसानों ने समितियों के माध्यम से 34.23 करोड़ रुपये कर्ज लिया है। पिथौरागढ़ जिला सहकारी बैंक (डीसीबी) की आठ शाखाओं ने इन किसानों को कर्ज दिया। सहकारी समितियों के जिला सहायक (एआर) निबंधक पान सिंह राणा ने बताया कि मौजूदा वित्त वर्ष में 34.23 करोड़ रुपये के सापेक्ष मई तक महज 15.96 करोड़ रुपये (47 प्रतिशत) के कर्ज की वसूली ही हो सकी है, जबकि 18.27 करोड़ रुपये की वसूली अभी बची है। पिछले साल इस अवधि में 28.06 करोड़ के सापेक्ष 18.51 करोड़ (66 प्रतिशत) के कर्ज की वसूली हुई थी।
एआर राणा ने बताया कि पिछली बार 2.63 करोड़ रुपये के बकाएदार 831 सदस्यों को वसूली प्रमाणपत्र (आरसी) जारी किए गए। इनमें से 102 किसानों ने कर्ज जमा कराया। शेष 732 को डिफॉल्टर सूची में डाला गया। एआर का कहना है कि कर्ज नहीं चुकाने वाले कर्जदारों को जुलाई में नोटिस भेजे जाएंगे। प्रत्येक 15 दिनों के अंतराल में तीन नोटिस दिए जाएंगे। फिर भी कर्ज नहीं चुकाने पर आरसी की सिफारिश की जाएगी। किसानों का कहना है कि कर्ज नहीं चुका पाने की वैसे तो कई वजहें हैं, लेकिन पिछले साल नवंबर में हुई नोटबंदी भी इसकी बड़ी वजह रही।
बैंकों के 59 करोड़ रुपये के कर्जदार हैं किसान
चंपावत। चंपावत जिले में 24 हजार से अधिक किसान किसी न किसी योजना के कर्जदार हैं। इसमें विभिन्न बैंकों से 59 करोड़ रुपये का कर्ज लिया गया है। ये कर्ज किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी), फसली एवं टर्म लोन के रूप में लिया गया है। लीड बैंक प्रबंधक (एलबीएम) आनंद सिंह रावत ने बताया कि चंपावत जिले में कुल 430 करोड़ रुपये के कर्ज में से 21 प्रतिशत से अधिक कर्ज किसानों द्वारा लिया गया है। सहकारी समितियों के कर्ज सहित कुल 93 करोड़ रुपये का कर्ज करीब 28 हजार खेतिहरों ने लिया है। बैंकों का कर्ज नहीं चुकाने की वजह से 115 किसानों से राजस्व विभाग के माध्यम से वसूली की प्रक्रिया की गई है।
आत्मघाती कदम न उठाएं किसान : नवीन
चंपावत। भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) के जिलाध्यक्ष नवीन सिंह करायत का कहना है कि सरकारी अमले की उदासीनता किसानों को खुदकुशी की तरफ धकेल रही है। पार्टी ने किसी भी तरह के आत्मघाती कदम नहीं उठाने की किसानों से अपील करते हुए संघर्ष की राह अपनाने का एलान किया है। कहा कि 20 जून को जिला मुख्यालय में कलक्ट्रेट में किसान प्रदर्शन करेंगे। पिछले कर्ज माफी के अलावा ब्याज रहित कर्ज, वक्त पर बीज, खाद, सिंचाई के प्रबंध करने की मांग की जाएगी। खेती के लिए खतरा बन रहे सुअर, बंदर सहित कई जंगली जानवरों से निजात दिलाने को ठोस कदम उठाना बेहद जरूरी है। कृषि उपज के लिए वाजिब दाम के साथ मंडी का विस्तार किया जाए।
कर्ज से ज्यादा ब्याज में दे दिए
तल्लादेश के मंच गांव के बची सिंह ने 1998 में 50 हजार का कर्ज लिया। अदरक, लाई, गेहूं, मड़ुवा की खेती करने वाले बची 20 साल बाद भी इस रकम को नहीं चुका पाए हैं। बस नोटिस से बचने के लिए वह हर साल ब्याज की रकम चुका रहे हैं। बची सिंह का कहना है कि वह कर्ज से अधिक ब्याज दे चुके हैं। इसी तरह शिवतोला के हीरा सिंह 70 हजार रुपये के कर्ज को नहीं चुका पाए हैं। ग्वानी गांव के नाथ सिंह ने दस साल पहले समिति से 40 हजार रुपये कर्ज लिया। यह कर्ज एक दशक बाद भी नहीं चुकाया जा सका। अलबत्ता 22 हजार रुपये ब्याज के रूप में दे चुके हैं। इन किसानों का कहना है कि जंगली जानवरों के अलावा किसानों को वक्त पर बीज, खाद एवं अन्य मदद नहीं मिल सकने से खेती उन्हें कर्ज के चक्र में धकेल रही है।
खेती से नहीं हो रहा भरण-पोषण
चंपावत। बड़ोली गांव के किसान 65 वर्षीय जयदत्त भट्ट उम्र के इस पड़ाव में भी खेती से जुड़े हैं, लेकिन खेती उनके लिए मुनाफे का सौदा नहीं है। अदरक, गहत, मड़ुवा, गडेरी की खेती करने के बावजूद वह खेती से अपने परिवार का भरण-पोषण नहीं कर पा रहे हैं। भट्ट का कहना है कि 2015 में उन्होंने पत्नी ममता के नाम से 20 हजार रुपये कर्ज लिया, लेकिन खेती से कमाई नहीं होने से उसे चुका नहीं पा रहे है। नोटिस आने पर इधर-उधर से रुपये लेकर ब्याज चुका रहे हैं।
मौसम बना बड़ी चुनौती
लोहाघाट। बाराकोट विकासखंड के खोलासुनार के कैलाश वर्मा के लिए खेती आमदनी का बड़ा जरिया है, लेकिन कभी ओलावृष्टि, कभी बारिश न होने से उनकी मुश्किलें कम नहीं हो रही है। कैलाश ने खोला सुनार सहकारी समिति से 50 हजार रुपये कर्ज लिया, लेकिन इसे चुकाना उन्हें कठिन हो रहा है।
वक्त पर नहीं मिल रही मदद
किसान चंद्रदत्त जोशी का कहना है कि खेती के लिए पहाड़ पर हालात कतई अनुकूल नहीं है। ज्यादातर खेत सिंचाई सुविधा से कटे हैं। ठीकठाक बारिश हुई भी, तो जंगली जानवर उनके लिए मुसीबत बनते हैं। इससे निपटने के लिए न कृषि विभाग और नहीं सरकारी अमले की ओर से कोई पहल की जा रही है और खामियाजा किसानों को भुगतना पड़ रहा है।
खेती से मुंह मोड़ने को मजबूर किसान
चंपावत। बनलेख के धर्मेंद्र का कहना है कि खेती किसानों को खून के आंसू दे रही है। लगातार मेहनत करने के बावजूद जंगली जानवर उनकी सारी मेहनत पर पानी फेर रहे हैं। सड़क से कटे इलाकों के किसानों को सड़क तक पैदावार को पहुंचाना कठिन हो रहा है। ऐसे में वह खेती से मुंह मोड़ने को मजबूर हो रहे हैं।