चंपावत। साक्षरता मिशन की परियोजना की समयावधि 30 सितंबर को पूरा हो रही है। इस तिथि के बाद ये कार्यक्रम आगे बढ़ेगा या नहीं? ये अभी तय नहीं है। मगर जिले की साक्षरता की तस्वीर कागजों में तो बेहद चमकीली है। लेकिन जमीनी हालात आंकड़ों से मेल नहीं खा रहे हैं। और तो और जिले में 28 महीने से निरक्षरों को साक्षर करने वाली सामग्री (प्रोग्राम कोस्ट) के लिए एक भी रुपया नहीं मिला है। निरक्षरों को सिखाने के लिए जरूरी पुस्तकें तक इस अवधि में नहीं मिल सकी है। साक्षर सामग्री के बगैर ही निरक्षरों को साक्षर बनाया जा रहा है।
प्रदेश में चंपावत, बागेश्वर, ऊधमसिंह नगर, उत्तरकाशी, टिहरी और हरिद्वार के 2726 ग्राम पंचायतों में साक्षर भारत मिशन का कार्यक्रम 2009 से चल रहा है। चंपावत जिले की 289 ग्राम पंचायतों में स्थापित लोक साक्षरता केंद्र के जरिये 15 वर्ष और उससे अधिक के 38617 निरक्षरों को साक्षर (लिखने, पढ़ने की समझ लायक) बनाने का लक्ष्य था। विभागीय आंकड़ों में 38054 लोग साक्षर भी हो चुके हैं। महज 563 निरक्षरों को ही अब साक्षर करना बाकी है। साक्षरता अभियान के जिला समन्वय महेश जोशी का कहना है कि चारों विकास खंडों में से बाराकोट व लोहाघाट विकासखंड पूरी तरह साक्षर हो चुके हैं।
लोक साक्षरता के जिला परियोजना अधिकारी दिलेर सिंह राजपूत ने बताया कि बेसिक लर्निंग असेसमेंट के तहत होने वाली इस परीक्षा में निरक्षरों को अक्षर और चित्र के जरिये पढ़ना, लिखना व बोलना सिखाया जाता है। चंपावत विकासखंड के 201 और पाटी विकासखंड के 362 साक्षरों ने पिछले महीने परीक्षा दी है। अभी इसका परीक्षा परिणाम नहीं आया है।
साक्षरता मिशन के सरकारी आंकड़े तो जरूर चमकदार हैं, लेकिन जमीनी स्तर (ग्राम पंचायत स्तर) पर योजना को संचालित करने वाले प्रेरकों को बीते 16 महीने से मानदेय नहीं मिला है। सिर्फ मानदेय ही नहीं, साक्षरता की जरूरी सामग्री के लिए भी धन नहीं मिल रहा है। 2015-16 वित्त वर्ष में मात्र एक माह की राशि मिली है। यानि अप्रैल 2015 के बाद से साक्षरता के लिए एक भी रुपया नहीं मिला है।
लोक साक्षरता केंद्र पिछले 28 महीने से बिना साक्षरता सामग्री के ही निरक्षरों को पढ़ा रहे हैं। प्रोग्राम कोस्टिंग से शिक्षण सामग्री समाचार पत्र, पत्र-पत्रिकाएं, संदर्भ व्यक्ति, प्रकाश व्यय, कार्यालय व्यय आदि पर खर्चे किए जाते हैं। प्रेरक संगठन के संजय चौड़ाकोटी का कहना है कि मानदेय के बगैर प्रेरकों की परेशानी बढ़ रही है। वहीं प्रोग्राम कोस्टिंग की रकम नहीं मिलने से भी काम के संचालन में परेशानी हो रही है।
कोट
प्रोग्राम कोस्टिंग की रकम प्राप्त नहीं हुई है। इस कारण जिलों को रकम नहीं भेेजी जा सकी है। अलबत्ता प्रेरकों का मानदेय जल्द भेजा जा रहा है। राज्य परियोजना समन्वयक के पद के काफी समय से खाली होने से योजना में असर पड़ रहा है।
पदमेंद्र सकलानी, प्रबंधक, राज्य साक्षरता परियोजना देहरादून।