बनबसा (चंपावत)। विजय दिवस पर मौजूद वीरांगनाएं अपने पतियों और पुत्रों का स्मरण कर भावविभोर हो उठीं। उनका मानना है कि असमय किसी व्यक्ति के चले जाने का दुख और टीस तो उम्र भर रहता है, लेकिन साथ ही उन्हें वीर सेनानी की पत्नी या माता होने का गर्व भी है।
चीन युद्ध के शहीद उत्तम चंद की पत्नी सरस्वती चंद का विवाह 13 वर्ष की आयु में हुआ था। कुछ समय बाद ही वो विधवा हो गई। तब से वे साध्वी की तरह और सामाजिक कार्यों में अपना जीवन बिता रही हैं।
उन्होंने अपनी सात बीघा भूमि में से चार बीघा भूमि प्राथमिक पाठशाला पचपकरिया और शहीद उत्तम चंद विद्यामंदिर के लिए दान दी है। पति के नहीं होने के बाद सरकार और सेना से मिल रही सुविधाओं पर वे आभार जताती हैं।
वर्ष 1965 के भारत-पाक युद्ध के शहीद किशन सिंह की पत्नी लक्ष्मी देवी का मानना है कि पति के असमय जाने का दुख तो है, लेकिन इस बात का भी गर्व है कि उनके पति ने अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाई।
वे सरकार से मिल रही सुविधाओं से संतुष्ट हैं। सैनिक परिवारों के वृद्ध आश्रितों को अच्छी मेडिकल सुविधाएं निकटतम स्थानों पर मुहैया कराने की मांग करती हैं।
कारगिल शहीद खीम सिंह कुंवर की माता लक्ष्मी देवी का मानना है कि शहीद परिवारों को भी सरकार से मदद मिलनी चाहिए। जिन शहीदों की पत्नियां ससुराल छोड़कर अन्यत्र चली जाती हैं, उनके बारे में सरकार और सेना को सोचना होगा।