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दिव्यांगता को पछाड़ मिसाल बने बहादुर बुद्धिबल्लभ

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चंपावत। हाथ में वजन तौलने वाली मशीन के साथ पांव घसीटकर चलते एक बुजुर्ग को जो कोई देखता, एक बारगी ठहर जाता है। 65 वर्ष में उसके जीवट को सलाम करता। 47 साल से दिव्यांगता के साथ जी रहा यह बुजुर्ग किसी से मदद की गुहार नहीं लगाता, बल्कि काम कर अपने पांवों पर खड़ा है। साथ ही खुद स्वाभिमान की जिदंगी जीने के साथ दूसरों के लिए मिसाल भी बना हुआ है।
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लोहाघाट विकासखंड के अठखंडी गांव के बुद्धिबल्लभ जोशी 47 वर्ष से लकवाग्रस्त है। इस विषम हालत में भी वे स्वाभिमान के साथ जीवन जी रहे है। पिछले तीस साल से वह वजन तोलने की मशीन को आय का जरिया बनाकर रोजाना 100 से 150 रुपये की कमाई से अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं। किसी पर आश्रित न रहकर दूसरों के लिए मिसाल बने है।

कृषक चूड़ामणि के बेटे बुद्धिबल्लभ को 18 साल की उम्र में लकवा पड़ गया था। एक बार नदी में नहाते समय उनके पांव में अचानक झनझनाहट सी हुई और उनके शरीर के एक हिस्से ने काम करना बंद कर दिया। तब न दवा के लिए धन था, न सड़क, न ही अस्पताल। सुविधा और संसाधन की कमी से उपचार के बजाय झाड़-फूंक कराया, लेकिन दाहिने पांव और हाथ में सुधार नहीं हो सका। बाई आंख से दिखना भी बंद हो गया।
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250 रुपये में खरीदी वजन तौलने वाली मशीन से शुरू में वजन तौलने के लिए 25 पैसे मिलते थे और अब पांच रुपये तक मिल जाते हैं। कभी लोहाघाट, तो कभी चंपावत और कभी पिथौरागढ़ में वजन तौलने का काम करते हैं। अविवाहित बुद्धिबल्लभ बताते हैं कि रोजाना औसतन 100 से 150 रुपये कमाने से वे किसी पर आश्रित नहीं हैं। दिव्यांग पेंशन के एक हजार रुपये मासिक के अलावा कोई अन्य सरकारी इमदाद नहीं मिलती है।
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