पहाड़ के घरों की तिबारियों, चौखटों व खिड़कियों पर लकड़ी से की जाने वाली कारीगरी, काष्ठकला के कारीगरों की उपेक्षा के कारण गायब होने लगी है। पुराने घरों को छोड़ दिया जाय तो नए बनने वाले मकानों में अब यह कारीगरी काफी कम दिख रही है। ऐसे में कर्णप्रयाग तहसील के बैनोली गांव के राज मिस्त्रियों ने इस शिल्पकाल को जीवित रखने के लिए संग्रहालय बनाने की मांग की है।
उत्तराखंड में घरों की चौखट व खोली पर भगवान गणेश सहित फूल, पत्तियां व वास्तु से संबंधित आकृतियां बनाने में पहाड़ के काष्ठकला के राजमिस्त्रियों का विशेष योगदान है। करीब 25 साल पहले तक पहाड़ में लकड़ी की कारीगरी को विशेष महत्व दिया जाता था, लेकिन मशीनी उपकरण व वन अधिनियम के कारण इस कारीगरी पर संकट छा गया। हालांकि आज भी काष्ठकला के जरिए राजमिस्त्री इसे बचाने के प्रयास में जुटे हैं, लेकिन उपकरण खरीदने के लिए उचित अनुदान व तकनीकी प्रशिक्षण देने की व्यवस्था न होने से यह कारीगरी हाशिए पर चली गई है।
बैनोली के राज मिस्त्रियों ने इस कला को विलुप्त होने से बचाने के लिए चमोली जिले के सीडीओ डॉ. ललित नारायण मिश्रा से मांग की। राज मिस्त्रियों की मांग पर मिश्रा ने काष्ठकला को जीवित रखने के लिए पर्यटन एवं संस्कृति विभाग को संग्रहालय बनाने के लिए प्रस्ताव तैयार करने को कहा है।