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पहाडी क्षेत्रों में जमीन को रूखा बना रहे हैं चीड़ के पेड़

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कर्णप्रयाग। पहाड़ी क्षेत्रों में अत्यधिक मात्रा में होने वाले बांज, मोरू, खरसू, बुरांश, काफल, अगिंयार, फनियाट के जंगलों में चीड़ के पेड़ों की बढ़ती संख्या से इन वनों के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। यदि समय रहते चीड़ के पौधों के विस्तार पर रोक नहीं लगाई गई तो वनों पर संकट आ सकता है।
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वरुणावत तथा दयूड़ी डांडा में हो रहा भूस्खलन का मुख्य कारण चीड़ के जंगल हैं। कर्णप्रयाग ब्लाक के जाख, कलियाड़ी, भटग्वाली, नंदासैंण, जखेट, खेती, पिंडवाली, बडेत, छांतोली, पुनगांव, बिसोंणा, किरसाल आदि के जंगलों में लगातार चीड़ के पौधों की संख्या बढ़ रही है। चीड़ की जड़ से निकलने वाला एलीलोपैथी रसायन और पत्तियों से लिगिनिग की मात्रा ज्यादा होने से पीरूल नहीं सड़ता है, जिससे चीड़ के पेड़ों के नीचे नई वनस्पतियां जम नहीं पाती हैं।
पर्यावरणविद् चंडी प्रसाद भट्ट कहते हैं कि चीड़ की बेहताशा बढ़ोतरी ने पर्यावरण को खासा नुकसान पहुंचाया है। जंगलों में खाली स्थानों पर बांज के पौधे लगाने चाहिए। नई पीढ़ी को जागरूक होकर चौड़ी पत्ती वाले वनों की उपयोगिता को समझना होगा। लगातार बढ़ रहे धरती के तापमान एवं मौसम में हो रहे परिवर्तन का असर हमारी वनस्पतियों पर देखा जा रहा है। इससे भी वनों का विकास और विस्तार प्रभावित हो रहा है।
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