हरीश रावत ने भूमिगत तरीके से जो अभियान चलाया उसका नतीजा फ्लोर पर आया। मगर, इतना जरूरत है कि इस खेल में हरीश के हाथ बाजी लगना भाजपा की नादानियों का ही नतीजा था।
चार बरस से कांग्रेस के साथ प्रोग्रेसिव डेमोक्रेटिक फ्रंट (पीडीएफ) के गठजोड़ को तोड़ पाने में विफल रही भाजपा फ्लोर के अंक गणित में पिछड़ गई। भाजपा के रणनीतिकार पीडीएफ और कांग्रेस के अंदरूनी समीकरणों को भांपने में भूल कर गए। गठबंधन तोड़ने के लिए महाराज और कोश्यारी का जो फार्मूला भाजपा ने इस्तेमाल किया, वह कांग्रेस की रणनीति के आगे फेल हो गया। पीडीएफ में उक्रांद और निर्दलियों की ‘चौकड़ी’ के साथ बसपा की बढ़ती दूरियों का फायदा तक भाजपा नहीं ले पाई। बुधवार को फ्लोर सियासी अंक गणित में सबसे कमजोर कड़ी मानी जा रही पीडीएफ पूरी मजबूती के साथ कांग्रेस के पक्ष में खड़ी रही।
पीडीएफ के निर्दलीयों की नब्ज पढ़ने में हरीश रावत की महारत फ्लोर टेस्ट में भी काम कर गई। हरीश रावत ने दो बरस पहले सीएम की कुर्सी संभालते जिस चतुराई से पीडीएफ के सात विधायकों को साध कर रखा, वही अनुभव फ्लोर पर काम आया। रावत ने अपने प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय सहित कई कांग्रेसियों की खिलाफत पीडीएफ सदस्य दिनैश धने के लिए झेली। धने को हरीश ने न केवल मंत्री बनाया, बल्कि सियासी संकट के दो माह में उनकी टिहरी से चुनाव लड़ने की राह पक्की कर दी। पीडीएफ के लीडर मंत्रीप्रसाद नैथानी महाराज के आशीर्वाद के हमेशा अभिलाषी रहे हैं, लेकिन उन्हें अपना राजनीतिक भविष्य कांग्रेस के साथ बेहतर दिख रहा है।
दो बरस से महाराज भाजपा में हैं, लेकिन उनको अभी तक कोई अहम जिम्मेदारी नहीं मिली। ऐसे में मंत्री उनके साथ जुड़कर देवप्रयाग से कांग्रेस के टिकट को लेकर बन रही संभावनाओं को खत्म नहीं करना चाहते। उक्रांद विधायक प्रीतम पंवार भी अपना भविष्य कांग्रेस के साथ जोड़कर देख रहे हैं। पंवार यमुनोत्री से धनोल्टी विधानसभा में शिफ्ट होना चाहते हैं। उधर, निर्दलीय हरीश दुर्गापाल की निकटता इंदिरा हृदयेश से हैं, जिनकी भाजपा के साथ आने की कोई संभावना नहीं थी। सभी निर्दलीय विधायकों को अपना भविष्य कांग्रेस के साथ में दिख रहा है।
हालांकि यह भी साफ है, जिन सीटों पर यह निर्दलीय कांग्रेस के टिकट पर उतरना चाहते हैं, वहां पहले से बैठे कांग्रेस के दावेदार आने वाले समय में उनकी मुसीबतें बढ़ाएंगे। पीडीएफ की कमजोर कड़ी मानी जा रहे बसपा के दो विधायकों को लेकर बनी अनिश्चितता आखिरी समय तक बनी रही। भाजपा कैंप दोनों विधायकों को साथ मान चुका था? जिसका अंदेशा हरीश रावत को आखिरी समय तक रहा। निर्दलीय और उक्रांद के विधायक तो रावत के काफिले के साथ विधानसभा पहुंच गए थे, लेकिन बसपा के विधायक सबसे आखिर में आए। उनके पहुंचने के बाद विधानसभा गेट पर खड़े हरीश रावत ने राहत की सांस ली।