फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

उत्तराखंड के सियासी हालात की नब्ज टटोलने में चूके भाजपाई

Wed, 11 May 2016 09:33 AM IST
अरुणेश पठानिया-अजित सिंह राठी/ अमर उजाला, देहरादून
विज्ञापन
भगत सिंह कोश्यारी - फोटो : amar ujala
विज्ञापन
हरीश रावत ने भूमिगत तरीके से जो अभियान चलाया उसका नतीजा फ्लोर पर आया। मगर, इतना जरूरत है कि इस खेल में हरीश के हाथ बाजी लगना भाजपा की नादानियों का ही नतीजा था। 
विज्ञापन


चार बरस से कांग्रेस के साथ प्रोग्रेसिव डेमोक्रेटिक फ्रंट (पीडीएफ) के गठजोड़ को तोड़ पाने में विफल रही भाजपा फ्लोर के अंक गणित में पिछड़ गई। भाजपा के रणनीतिकार पीडीएफ और कांग्रेस के अंदरूनी समीकरणों को भांपने में भूल कर गए। गठबंधन तोड़ने के लिए महाराज और कोश्यारी का जो फार्मूला भाजपा ने इस्तेमाल किया, वह कांग्रेस की रणनीति के आगे फेल हो गया। पीडीएफ में उक्रांद और निर्दलियों की ‘चौकड़ी’ के साथ बसपा की बढ़ती दूरियों का फायदा तक भाजपा नहीं ले पाई। बुधवार को फ्लोर सियासी अंक गणित में सबसे कमजोर कड़ी मानी जा रही पीडीएफ पूरी मजबूती के साथ कांग्रेस के पक्ष में खड़ी रही।

पीडीएफ के निर्दलीयों की नब्ज पढ़ने में हरीश रावत की महारत फ्लोर टेस्ट में भी काम कर गई। हरीश रावत ने दो बरस पहले सीएम की कुर्सी संभालते जिस चतुराई से पीडीएफ के सात विधायकों को साध कर रखा, वही अनुभव फ्लोर पर काम आया। रावत ने अपने प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय सहित कई कांग्रेसियों की खिलाफत पीडीएफ सदस्य दिनैश धने के लिए झेली। धने को हरीश ने न केवल मंत्री बनाया, बल्कि सियासी संकट के दो माह में उनकी टिहरी से चुनाव लड़ने की राह पक्की कर दी। पीडीएफ के लीडर मंत्रीप्रसाद नैथानी महाराज के आशीर्वाद के हमेशा अभिलाषी रहे हैं, लेकिन उन्हें अपना राजनीतिक भविष्य कांग्रेस के साथ बेहतर दिख रहा है।
विज्ञापन


दो बरस से महाराज भाजपा में हैं, लेकिन उनको अभी तक कोई अहम जिम्मेदारी नहीं मिली। ऐसे में मंत्री उनके साथ जुड़कर देवप्रयाग से कांग्रेस के टिकट को लेकर बन रही संभावनाओं को खत्म नहीं करना चाहते। उक्रांद विधायक प्रीतम पंवार भी अपना भविष्य कांग्रेस के साथ जोड़कर देख रहे हैं। पंवार यमुनोत्री से धनोल्टी विधानसभा में शिफ्ट होना चाहते हैं। उधर, निर्दलीय हरीश दुर्गापाल की निकटता इंदिरा हृदयेश से हैं, जिनकी भाजपा के साथ आने की कोई संभावना नहीं थी। सभी निर्दलीय विधायकों को अपना भविष्य कांग्रेस के साथ में दिख रहा है।

हालांकि यह भी साफ है, जिन सीटों पर यह निर्दलीय कांग्रेस के टिकट पर उतरना चाहते हैं, वहां पहले से बैठे कांग्रेस के दावेदार आने वाले समय में उनकी मुसीबतें बढ़ाएंगे। पीडीएफ की कमजोर कड़ी मानी जा रहे बसपा के दो विधायकों को लेकर बनी अनिश्चितता आखिरी समय तक बनी रही। भाजपा कैंप दोनों विधायकों को साथ मान चुका था? जिसका अंदेशा हरीश रावत को आखिरी समय तक रहा। निर्दलीय और उक्रांद के विधायक तो रावत के काफिले के साथ विधानसभा पहुंच गए थे, लेकिन बसपा के विधायक सबसे आखिर में आए। उनके पहुंचने के बाद विधानसभा गेट पर खड़े हरीश रावत ने राहत की सांस ली।
विज्ञापन

योजनाकारों की भीड़, कारगर योजनाएं गायब

अजय भट्ट - फोटो : file photo
भाजपा में योजनाकार तो थे, मगर कारगर योजनाएं नहीं थी। हरीश रावत को फ्लोर टेस्ट में मात देने के लिए भाजपा की हर रणनीति बेदम साबित हुई। स्टिंग प्रकरण को छोड़ दे तो भाजपा एक भी ऐसा झटका डेढ़ महीने में हरीश रावत को नहीं दे सकी, जिससे राजनीतिक जलजला आ जाए। स्टिंग नहीं आता तो राज्य में डेढ़ महीने का राष्ट्रपति शासन लागू कराकर भाजपा को इज्जत बचाने का मौका भी नहीं मिलता।

दरअसल, भाजपा ने इस पूरे घटनाक्रम में एक गलती के सुधारने के बजाय दूसरी गलती करने का सिलसिला चालू रखा। 18 मार्च को वित्त विनियोग विधेयक के लिए भीमलाल को व्हिप रिसीव ही नहीं कराया। यही नहीं, व्हिप ना तो स्पीकर को रिसीव कराया और ना ही रजिस्टर मैन्टेन किया। इसके बाद विनियोग विधेयक पर मत विभाजन का पत्र स्पीकर को सुबह दस बजे से पहले नहीं दिया और फिर तीन बजे राज्यपाल को ज्ञापन सौंपा।

इसके बाद राज्यपाल को सौंपे भाजपा के ज्ञापन की प्रति पर बागी कांग्रेसियों के हस्ताक्षर भी करा दिए, जो कि तकनीकी रूप से गलत था। इस बात को पूर्व मंत्री हरक सिंह रावत ने भी स्वीकारा। न्यायालय में भी राज्य में संवैधानिक संकट की बात करने केबजाय सरकार के बहुमत में नहीं होने दलील देते रहे। सर्वोच्च न्यायालय में भी विश्वासमत पर ज्यादा जोर दिया। फ्लोर टेस्ट से दो दिन पहले कांग्रेसी विधायकों के स्टिंग दिखाने का दांव भी उलटा पड़ा।

ठोस योजना के अभाव और गलतियों के सिलसिले ने भाजपा के रणनीतिकारों के राजनीतिक कौशल पर भी सवाल खड़े कर दिए। दूसरी तरफ मुख्यमंत्री पद के दावेदार भगत सिंह कोश्यारी को इस मुहिम में राज्य के बड़े नेताओं ने अकेला छोड़ दिया। पूर्व सीएम बीसी खंडूड़ी तो अलग ही रहे, पूर्व सीएम रमेश पोखरियाल निशंक शुरूआती दौर में तो मुख्य धारा में रहे, लेकिन बाद में उन्होंने भी दिल्ली रहने में ही भलाई समझी।

उधर, केंद्र से आए कैलाश विजय वर्गीय भी कोई करिश्मा नहीं कर सके। रही सही कसर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष अजय भट्ट ने एक दिन पहले हरिद्वार में पूरी कर दी। उन्होंने जैसे ही जिप अध्यक्ष के चुनाव में बसपा को समर्थन करने का ऐलान किया, उसी क्षण स्थिति बिगड़ गई और बसपा ने रुख स्पष्ट करते हुए कांग्रेस का साथ देना ज्यादा मुनासिब समझा। 
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें