चिकित्सा और स्वास्थ्य कल्याण विभाग की कार्यशाला में कन्या भ्रू्ण हत्या की समस्या पर चर्चा हुई। जिला जज डॉ. ज्ञानेंद्र शर्मा ने कहा कि भ्रूण हत्या रोकने के लिए 21 साल पहले कानून बन गया था, इसके बावजूद देश में एक हजार पुरुषों पर मात्र 940 महिलाएं हैं। छह साल तक के आयु वर्ग में यह अनुपात और भी चिंताजनक है।
यहां मुख्य शिक्षा अधिकारी (सीईओ) कार्यालय के सभागार में स्वास्थ्य विभाग की कार्यशाला में मुख्य अतिथि जिला जज डॉ. ज्ञानेंद्र शर्मा ने कहा कि कन्याओं के प्रति देश में लोगों की सोच आंकड़ों से स्पष्ट हो जाती है। कानून बनने के 21 साल बाद भी हालत चिंताजनक है। छह साल से कम आयु में लिंगानुपात की दयनीय हालत से जाहिर है कि कन्याओं के प्रति नकारात्मक सोच अभी बढ़ रही है।
उन्होंने कहा कि दहेज प्रथा, महिला सुरक्षा सहित कई सामाजिक कारणों के चलते लोग अधिकतर लोग पुत्र प्राप्ति की ही कामना करते हैं। महिलाओं के लिए अनुकूल माहौल के साथ ही इस सोच में बदलाव की जरूरत है। सीईओ आरसी आर्य ने कहा कि कन्या भ्रू्ण हत्या आदि सामाजिक समस्याओं को लेकर जनजागरण करने में शिक्षण संस्थाओं की भूमिका कारगर साबित हो सकती है।
दीप जोशी ने लिंगानुपात की मौजूदा हालत पर चिंता जताई। डॉ. जितेंद्र तिवारी ने लिंग परीक्षण के कानून को सख्ती से लागू कराने पर जोर दिया। कार्यशाला में जिला अस्पताल के रेडियोलॉजिस्ट डॉ. खेमपाल, स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. रीमा उपाध्याय, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण की सचिव सिविल जज सीनियर डिवीजन ज्योत्सना आदि ने भी विचार रखे। छात्र-छात्राओं ने रंगारंग कार्यक्रम पेश किए।