बागेश्वर। कुमाऊं की लोकगाथाओं में राजुला मालूशाही की अमर प्रेम गाथा भी शामिल है। इसके नायक-नायिका के माता-पिता का परिचय भी उत्तरायणी मेले के दौरान बागेश्वर के सरयू बगड़ में ही हुआ था।
मोहल्ला बिलौना निवासी कुमाउंनी साहित्यकार रमेश पर्वतीय बताते हैं कि इस प्रेमगाथा के आधार पर उत्तरायणी की प्राचीनता का पता चलता है। लोकगाथा के मुताबिक कत्यूरों की राजधानी बैराठ (चौखुटिया) थी। तब बैराठ में राजा दुलाशाह शासक थे। उनकी कोई संतान नहीं थी। इसके लिए उन्होंने कई मनौतियां मांगी। अंत में संतान की प्राप्ति के लिए उन्होंने बागेश्वर आकर बागनाथ के मंदिर में शिव की आराधना की। इसी दौरान उनकी मुलाकात भोट के व्यापारी सुनपत शौका और उसकी पत्नी गांगुली से हुई। वह भी संतान की चाहत में यहां आए थे। दोनों ने समझौता किया कि यदि उनकी संतानें लड़का और लड़की हुई तो उनकी आपस में शादी कर देंगे।
भगवान बागनाथ की कृपा से ऐसा ही हुआ। बैराठ के राजा का पुत्र मालूशाही हुआ जबकि सुनपत शौका की बेटी का नाम राजुला रखा गया लेकिन कतिपय कारणों से उनकी शादी में बाधाएं आने लगीं। उनके अजर-अमर प्रेम की दास्तान इतिहास में जुड़ गई कि किस प्रकार एक राजा राजपाट छोड़कर शौका समाज की सामान्य सी कन्या के लिए जोगी बनकर जंगल में भटका। कुमाऊं की इस लोकगाथा के साथ एक लोकगीत भी प्रचलित है। रंगकर्मी घनश्याम भट्ट घनदा इस गीत की जानकारी देते हुए बताते हैं लोकगाथा से जुड़ा गीत ‘सुनपत शौके की चेलि राजुली शौक्यांणा, बैराठ बाट लागी’ गीत राजुला मालूशाही नाटक में अक्सर गाया जाता है।