बागेश्वर। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ देश के जिन स्थानों पर बड़ी लड़ाइयां लड़ी गईं उन्हीं में एक स्थान बागेश्वर भी है। कुली बेगार प्रथा का अंत बागेश्वर में ही हुआ था। अंग्रेजी हुकूमत की जड़ों को हिलाने वाली यह एक ऐसी क्रांति थी जिसको राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने न केवल रक्तहीन क्रांति का नाम दिया बल्कि आंदोलन से प्रभावित होकर 1921 में बागेश्वर पहुंचकर स्वराज भवन की नींव रखी। अनासक्ति आश्रम कौसानी, बोरगांव का चर्खा और स्वराज भवन से आज भी राष्ट्रपिता की यादें जुड़ी हैं।
बागेश्वर को कुली बेगार आंदोलन से राष्ट्रीय पहचान मिली। इसी आंदोलन से प्रभावित होकर उसी साल जून में गांधी जी कौसानी आए और 15 दिनों तक वहां रहे। गांधी जी ने वहां अनासक्ति योग पर टीका लिखी। 22 जून को वह बागेश्वर पहुंचे। उन्होंने जनसभा के बाद ऐतिहासिक नुमाइशखेत मैदान में स्वराज भवन का शिलान्यास किया। बागेश्वर का यह स्वराज भवन ऐतिहासिक स्थल है। इसी स्वराज भवन में देश की स्वतंत्रता को लेकर आंदोलनों के ताने-बाने बुने गए।
आज भी यहां विभिन्न प्रकार की राजनीतिक गतिविधियां होती हैं। स्वराज भवन के बाहर गांधी जी एक प्रतिमा भी स्थापित की गई है। महात्मा गांधी जब यहां आए तो बोरगांव के जीत सिंह टंगड़िया ने उन्हें एक चर्खा भेंट किया।
तब गांधी ने कहा था कि यह चर्खा स्वदेशी आंदोलन में काफी मददगार साबित होगा। इसके बाद बागेश्वरी चर्खा प्रसिद्ध हो गया। आज भी बोरगांव में स्थित चर्खा केंद्र ऐतिहासिकता को बताता है। कौसानी के अनासक्ति आश्रम में गांधी जी के चित्र सहित उनसे जुड़े तमाम दस्तावेज विशेष रूप से सहेज कर रखे गए हैं। बागेश्वर में स्थित अनासक्ति आश्रम, बोरगांव, नुमाइशखेत मैदान हमेशा महात्मा गांधी की याद दिलाते रहेंगे।