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धार्मिक, सांस्कृतिक समेत कई परंपराओं को समेटे हुए है यह मेला 

Fri, 13 Jan 2017 11:47 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो बागेश्वर
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। भगवान बागनाथ की नगरी में लगने वाला उत्तरायणी मेला धार्मिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और व्यापारिक परंपराओं को समेटे हुए है। इस मेले में उत्तराखंड के विभिन्न क्षेत्रों से बड़ी संख्या में प्रवासी लोग पहुंचते हैं।  
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सरयू, गोमती और विलुप्त सरस्वती के संगम पर बसी बागनाथ की नगरी को उत्तराखंड की दूसरी काशी कहा जाता है। यहां भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजते हैं। मकर संक्रांति पर्व के मौके पर श्रद्धालु संगम पर डुबकी लगाकर भगवान बागनाथ, कालभैरव नाथ, समेत अन्य मंदिरों में जलार्पण कर पुण्य अर्जित करते हैं। पंडित हेम चंद्र जोशी का कहना है इस मंदिर में बेलपत्री के साथ 108 लोटा जलार्पण कराकर रुद्री पाठ कराने से भक्तों सभी मनोकामनाएं पूरी होती है। शिव महापुराण के अनुसार संगम और सूरजकुंड में चूड़ाकर्म, जनेऊ संस्कार, पित्तरों के निमित्त श्राद्ध तर्पण कराने का बड़ा महत्व है। 

इस मेले में सरयू वार के लोग एक गते जबकि पार के लोग दो गते मीठे आटे से बने घुघुते उड़ाते हैं। बच्चे काले कौव्वा काले काले..., घुघुती माला खाले खाले... पुकार कर अपने पास बुलाकर उन्हें घुघुते खिलाते हैं।  मकर संक्रांति के अवसर पर 14 जनवरी 1921 को आजादी के दीवानों ने कुली उतार, बेगार और बेगार जैसे अंग्रेजी हुकूमत के काले कानूनों के रजिस्टर सरयू बहा दिए थे। व्यापारिक दृष्टि से इस मेले का पहले से अपना अलग महत्व रहा है।  
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पहले यहां तिब्बत से व्यापारी नमक और ऊनी वस्त्र आते थे। मेले में अभी मुनस्यारी, धारचूला, फरसाली, डीडीहाट आदि स्थानों से ऊनी वस्त्र, दानपुर से रिंगाल से बनी वस्तुएं, काली कुमाऊं से लोहे से बने बर्तन और औजार को लेकर आते हैं।  दिल्ली, उप्र, हरियाणा से भी बड़ी संख्या में व्यापारी मेले में आकर अपनी दुकान लगाते हैं।  
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