बागेश्वर। तीन दिनी राष्ट्रीय कुमाउनी भाषा सम्मेलन का समापन हो गया है। अंतिम दिन वक्ताओं ने कुमाउनी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने का संकल्प लिया। यह भी कहा कि उत्तराखंड के सभी शिक्षण संस्थानों में कुमाउनी में पठन-पाठन होना चाहिए। इस अवसर पर कमला देवी, भास्कर भौर्याल के नेतृत्व में मालूशाही, न्योली और चांचरी का गायन किया गया।
मुख्य अतिथि साहित्यकार गोपाल दत्त भट्ट ने कहा कि कुमाउनी भाषा का शिक्षण राज्य के सभी शिक्षण संस्थानों में किया जाना चाहिए। इसी से इस भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जा सकता है। समापन सत्र की अध्यक्षता करते हुए एडवोकेट जमन सिंह बिष्ट ने कहा कि कुमाउनी को संविधान की आठवीं अनुसूची में राजनीतिक इच्छाशक्ति के बल पर ही शामिल किया जा सकता है। पहरू के संपादक डॉ. हयात सिंह रावत ने कहा कि कुमाउनी के संरक्षण के लिए राज्य में भाषा अकादमी खोली जानी चाहिए। डॉ. रावत और भाषा सम्मेलन के संयोजक साहित्यकार वृक्ष पुरुष किशन सिंह मलड़ा ने आयोजन में सहयोग देने के लिए डॉ. कुंदन सिंह रावत, डॉ. राजीव जोशी, नरेंद्र खेतवाल, गोपाल बोरा के साथ ही सभी लोगों का आभार जताया। समापन दिवस पर साहित्यकार गोपाल दत्त भट्ट के विशेषांक का विमोचन किया गया। तमाम साहित्यकारों को सम्मानित किया गया। वहां पर प्रेम प्रकाश उपाध्याय, कमल कवि कांडपाल आदि मौजूद थे।
कवि सम्मेलन: किलै जाम है गे फिर यो भीड़...
बागेश्वर। तीन दिनी राष्ट्रीय कुमाउनी भाषा सम्मेलन की दूसरी शाम कुमाउनी कवियों के नाम रही। देर रात तक हुए काव्यपाठ में कवियों ने खूब रंग जमाया।
कुमाउनी भाषा के सशक्त हस्ताक्षर नैनीताल के विख्यात उद्घोषक हेमंत बिष्ट ने किलै जाम है गे फिर यो भीड़, आज पंडी में-हलचल छ किलै गंभीर, आज पगडंडी में कविता सुनाकर समा बांधा। गिरीश चंद्र भावुक ने पुरानी पेंशन बहाली पर निशाना साधते हुए कहा-मोदी ज्यू हमर पेंशन हमुकैं लौटा जाया। युवा कवि कमल कवि कांडपाल ने ब्याव पड़ि जब सब लौटि जानी कविता प्रस्तुत की। गोपाल दत्त भट्ट ने जूंल कुणौछी जाण बखत कविता से रंग जमाया। डॉ. प्रदीप उपाध्याय के संचालन में हुए कवि सम्मेलन में किशन सिंह मलड़ा, डॉ. हयात सिंह रावत, केशवानंद जोशी, भुवन चंद्र सुयाल, दीपक सिंह भाकुनी, चंद्रशेखर कांडपाल, संजय जोशी सतत, शंकर दत्त जोशी, विनोद पंत, बहादुर सिंह बिष्ट, मोहन जोशी आदि ने काव्यपाठ किया। दीवान कनवाल ने कुमाउनी लोक गीतों से समा बांधा। संवाद
घरों से हो कुमाउनी बोलने की शुरुआत : हेमंत
बागेश्वर। उद्घोषक हेमंत बिष्ट ने कहा कि कुमाउनी, गढ़वाली, जौनसारी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने के प्रयास समय-समय पर हो रहे हैं। इसके लिए कुछ मापदंड होते हैं। उन मापदंडों को पूरा करने के लिए विद्वान और जनमानस अपने आप को तैयार कर रहा है। मापदंडों में यह है कि कितने प्रतिशत लोग उस भाषा को बोल रहे हैं। आज लोग कुमाउनी भाषा बोल रहे हैं। कुमाउनी बोलने में शर्म महसूस नहीं कर रहे हैं। घरों से ही कुमाउनी बोलना शुरू कर दें तो मापदंडों में खरे उतर सकते हैं। जिन परिवारों में दादा, पिता और बच्चे अपनी भाषा बोलते हैं, वे भाषाएं चलन में हैं। दादा नहीं बोलते, पिता बोलते हैं, बच्चे समझते हैं, बोलते नहीं। इसलिए घर में भी अपनी भाषा में बोलना चाहिए। बच्चों को अभिभावकों से आग्रह करना चाहिए कि कुमाउनी में बोलें, गढ़वाली में बोलें, जौनसारी में बोलें। सभी को लोकभाषा बोलनी चाहिए तभी इसका उत्थान होगा और भाषा का दर्जा मिलेगा।
खूब पसंद किए गए तुलेरा के कैलिग्राफी चित्र
बागेश्वर। तीन दिनी कुमाउनी भाषा सम्मेलन में युवा ललित तुलेरा के कैलिग्राफी चित्रों को खूब पसंद किया गया। तुलेरा ने कुमाउनी साहित्यकारों की कविता पर केंद्रित कैलिग्राफी चित्रों की प्रदर्शनी आयोजन स्थल पर लगाई थी।