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प्राचीन है कुमाउनी भाषा का इतिहास:प्रोफेसर नेगी

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बागेश्वर में कुमाऊंनी भाषा सम्मेलन में मौजूद लोग। - फोटो : BAGESHWAR
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बागेश्वर। बागेश्वर में तीन दिनी 13वां राष्ट्रीय कुमाऊंनी भाषा सम्मेलन का शनिवार को आगाज हो गया है। पहले दिन जानकारों ने कुमाऊंनी बोली की प्राचीनता पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम में कुमाऊंनी लोक साहित्य पर चर्चा के साथ ही लोकगीतों की प्रस्तुति दी गई और सांस्कृतिक संध्या का आयोजन हुआ।
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पूर्व जिला जज जयदेव सिंह, साहित्यकार कौस्तुभानंद चंदोला, विधायक चंदन राम दास ने सम्मेलन का शुभारंभ किया। वक्ताओं ने कहा कि आयोजकों का यह प्रयास कुमाऊंनी बोली के विकास में मील का पत्थर साबित होगा। कहा कि कुमाऊं के साहित्यकार कुमाऊंनी के विकास के लिए लगातार काम कर रहे हैं। यह सुखद है। देर-सबेर कुमाऊंनी बोली को संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान मिल जाएगा।
सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय अल्मोड़ा के इतिहास विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर विद्याधर सिंह नेगी ने कुमाऊंनी बोली पर स्लाइड शो के माध्यम से विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि कुमाऊंनी बोली हिंदी से भी समृद्ध है। कुमाऊंनी साहित्य का इतिहास हिंदी से भी पुराना है। चंद शासकों ने कुमाऊंनी को राजभाषा का दर्जा दिया था। उन्होंने ताम्रपत्रों में कुमाऊंनी के प्रयोग पर स्लाइड शो के माध्यम से प्रकाश डाला। इस दौरान विभिन्न साहित्यकारों की स्मृति में दिए जाने वाले पुरस्कारों की जानकारी दी गई।
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पहरू संस्था के संस्थापक डॉ. हयात सिंह रावत ने सम्मेलन की रूपरेखा रखी। शुभारंभ पर सुर सरिता राज संगम संस्था ने गीतों की प्रस्तुति दी। गायिका ईशा धामी ने शगुन आखर की प्रस्तुति दी। डॉ. केएस रावत, डॉ. गोपाल कृष्ण जोशी के संचालन में हुए कार्यक्रम में वरिष्ठ साहित्यकार गोपाल भट्ट, किशन मलड़ा, पूर्व मंत्री राम प्रसाद टम्टा, जूना अखाड़ा के महंत शंकर गिरी, डॉ. जमन बिष्ट, डायट के प्राचार्य डॉ. शैलेंद्र धपोला, ललित तुनेरा, पहरू की उप संपादक नीलम नेगी, रमेश प्रकाश पर्वतीय, साहित्यकार नीरज पंत, राजीव जोशी, प्रेम प्रकाश उपाध्याय, कमल कवि कांडपाल, रणजीत सिंह बोरा, दलीप खेतवाल, हरीश दफौटी, दीप पांडे आदि मौजूद रहे। शाम को हुई सांस्कृतिक संध्या का भी लोगों ने लुत्फ उठाया।
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