कांडा के पास जोगाबाड़ी की खूबसूरत प्राकृतिक गुफा पर्यटन से नहीं जुड़ सकी। गुफा में बहता सुंदर झरना, छोटी सी झील आदि मनमोहक आकृतियां प्रकृति की अनूठी धरोहरें हैं। यह आकृतियां लोगों को आकर्षित करती हैं। इस गुफा के संरक्षण की दिशा में कोई पहल नहीं हो सकी है।
कांडा के जोगाबाड़ी गांव में यह गुफा बाजार से करीब तीन किमी नीचे है। गुफा का प्रवेश द्वार अत्यधिक संकरा है। जिस कारण स्वस्थ लोग ही पेट के बल घिसटकर अंदर जा सकते हैं। वहां पहुंचने पर एक मायावी दुनिया से सामना होता है। गुफा के अंदरूनी छोर से एक झरना बहता है। जिससे गुफा हमेशा ही झील की तरह लबालब भरी रहती है।
गर्मियों में भी यहां दो फीट तक पानी रहता है। झरने का यह पानी स्थानीय नाले से होता हुआ भद्रकाली नदी में मिल जाता है। इस गुफा में सबसे हैरत में डालने वाली चीजें रंगीन चट्टानों पर बनी विशेष आकृतियां हैं।
गुफा की दीवारों से लेकर छत तक ऐसी दर्जनों आकृतियां हैं, जो ब्रह्मकमल, शेषनाग, शिव, ब्रह्मा, विष्णु आदि देवी-देवताओं और प्राकृतिक वस्तुओं जैसी नजर आती हैं।
कुछ लोगों का मानना है कि सदियों से बहते झरने के पानी से चट्टान की परतें घिस जाने के कारण ऐसी आकृतियां बनी हैं। संभवत: आदमी ऐसी कल्पना भी नहीं कर सकता। गुफा की लंबाई करीब दस मीटर, चौड़ाई छह मीटर, ऊंचाई करीब सात फीट है।
पांच साल पहले इस गुफा को खोजने वाले सामाजिक कार्यकर्ता अर्जुन माजिला ने बताया के इस स्थल के विकास के लिए लगातार मांग की जा रही है लेकिन सुनवाई नहीं हो सकी है।
जिला पर्यटन अधिकारी आरएस ऐरी ने बताया कि जोगाबाड़ी गुफा तक संपर्क मार्ग, आवासीय इकाई, स्थल सौंदर्यीकरण आदि के लिए 45 लाख का प्रस्ताव पर्यटन मुख्यालय को भेजा गया है। जिसे मंजूरी नहीं मिली है। इस गुफा को रावतसेरा मोटर मार्ग से भी जोड़ने की योजना है। इसके बाद अन्य संभावित विकल्पों पर विचार किया जाएगा।