बागेश्वर। विधानसभा चुनाव के लिए मंच सज चुका है। राजनीतिक दल जोरशोर से प्रचार कर रहे हैं। प्रत्याशी घर-घर जाकर लोगों को अपने पक्ष में मतदान करने को प्रेरित कर रहे हैं। हालांकि एक दौर वह भी था जब अधिकांश लोगों तक प्रत्याशी की पहुंच नहीं होती थी। ग्रामीण इलाकों में किस दल को मतदान करना है, इसका निर्णय भी ग्राम प्रधान और गांव के सयाने लोग मिल बैठकर तय करते थे। उनकी कही बातों का अनुसरण पूरा गांव करता था। 1957 के आम चुनाव में पहली बार मतदान करने वाले मयूं गांव के 85 वर्षीय बुजुर्ग हयात सिंह मेहता ने चुनाव को लेकर कुछ ऐसी ही जानकारियां साझा कीं।
बुजुर्ग मतदाता हयात सिंह बताते हैं कि वर्तमान समय में चुनाव आते ही शोरगुल शुरू हो जाता है। पांच साल के कार्यकाल में दर्शन नहीं देने वाले विधायक भी चुनाव के समय कई-कई बार गांवों के चक्कर लगा रहे हैं। रोजाना किसी न किसी के प्रत्याशी के समर्थक और राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता रोजाना घर-घर पहुंच रहे हैं। हालांकि 60 और 50 के दशक तक चुनाव को लेकर इतना शोर नहीं रहता था। उस समय गांवों में अधिक लोग शिक्षित भी नहीं थे। चुनाव के समय अधिकांश लोगों को प्रत्याशी को लेकर जानकारी भी नहीं होती थी। प्रत्याशी न्याय पंचायत स्तर पर जनसभा करते थे। जिसे सुनने के लिए लोग मीलों पैदल चलकर वहां पहुंचते थे। ग्राम प्रधान और गांव के कुछ बड़े बुजुर्ग प्रत्याशियों और राष्ट्रीय या राज्य स्तर के नेताओं को आधार बनाकर किसी एक राजनीतिक दल या प्रत्याशी के पक्ष में आम राय बनाते थे। जिसके अनुसार पूरा गांव उसी प्रत्याशी के पक्ष में मतदान करता था। हालांकि धीरे-धीरे समाज शिक्षित होने लगा तो लोगों की धारणा भी बदलने लगी। पढ़े-लिखे लोग अब वोट देने के लिए अपनी समझ का इस्तेमाल करने लगे। 80 के दशक तक आते-आते आम राय से वोट देने का चलन समाप्त हो गया। वर्तमान में अब मतदाता प्रत्याशी को अपने वोट का अहसास करा रहा है। वर्तमान समय लोकतंत्र के लिए स्वर्णिम काल है। जहां मतदाता अपने मत की कीमत समझने लगा है।