बागेश्वर के बिजयपुर का धौलीनाग मंदिर।
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कांडा/बागेश्वर। तहसील क्षेत्र के लोगों की अगाध आस्था के केंद्र धौलीनाग मंदिर में नवरात्र की पंचमी को भव्य मेले का आयोजन किया जाएगा। विजयपुर से डेढ़ किमी की दूरी पर पहाड़ी में स्थित भगवान धौलीनाग मंदिर में क्षेत्र के 22 गांवों के लोग पूजा अर्चना करते हैं। मेले के दौरान 22 हाथ लंबी मशाल जलाकर धौलीनाग मंदिर की परिक्रमा की जाती है।
धौलीनाग देवता को कालिया नाग का पुत्र माना जाता है। मान्यता है कि द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने यमुना नदी में रहने वाले कालिया नाग का मर्दन कर उसे दूर जाने का आदेश दिया था। इसके बाद कालिया नाग कुमाऊं में आकर रहने लगा। यहीं उसके पुत्र धवलनाग अथवा धौलीनाग का जन्म हुआ। कहा जाता है कि जिस स्थान पर धौलीनाग का मंदिर है, पूर्व में वहां बांज के एक पेड़ पर धौलीनाग निवास करते थे। एक बार जंगल में भीषण आग लगने पर उन्होंने ग्रामीणों को सहायता के लिए पुकारा था। उनकी पुकार सुनकर सबसे पहले धपोलासेरा गांव के भूल जाति के लोग बाइस हाथ लंबी मशाल जलाकर गए। उनको जाता देखकर पोखरी गांव के चंदोला भी साथ हो लिए। आसपास के अन्य गांवों के लोग भी पहुंचे। जिस स्थान से आवाज आई थी, वहां ग्रामीणों को नवरात्र की पंचमी के दिन दिव्यशिला मिली थी। जिसके बाद क्षेत्रवासियों ने वहां पर धौलीनाग का मंदिर बनाया और विधिविधान से पूजा अर्चना की। धपोलासेरा, कांडा, पोखरी, खांतोली, मिथुनकोट सहित आसपास के गांवों के लोग धौलीनाग को आराध्य देवता मानते हैं। नवरात्र के पंचमी के अलावा नाग पंचमी और ऋषि पंचमी के दिन भी मंदिर में भव्य मेला लगता है। मंदिर के प्रबंधन की जिम्मेदारी धपोला और पुजारी का कार्य धामी लोग संभाल रहे हैं।
धौलीनाग को लगाते हैं खीर का भोग
बागेश्वर। नवरात्र की पंचमी की सुबह से मंदिर में श्रद्धालु उमड़ने लगते हैं। शाम होने के बाद भीड़ बढ़ने लगती है। रात के समय देव डांगर अवतरित होते हैं। ग्रामीण चीड़ के छिलके की लंबी मशाल जलाकर मंदिर की परिक्रमा करते हैं। मंदिर आने वाले सभी लोग अपने साथ नई फसल का अनाज, दूध, दही, घी लेकर आते हैं। धौलीनाग देवता को खीर का भोग लगाया जाता है। इसी प्रसाद को भक्तों में भी वितरण किया जाता है।