बागेश्वर। भाई और बहन के अटूट प्रेम का पर्व है रक्षाबंधन। इस खूबसूरत त्योहार के दिन बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधती हैं और बदले में उन्हें भाइयों से ताउम्र सुरक्षा का वचन मिलता है। राखी के त्योहार में कई ऐसे भी किस्से मिलते हैं जो समाज को आपस में जोड़ने का काम करते हैं। इतिहास में चित्तौड़ के शासक राणा संग्राम सिंह की विधवा रानी कर्णावती का बादशाह हुमायूं को राखी भेजना और हुमायूं का उनके राज्य को बचाने के लिए मदद करना इसी का उदाहरण है। वर्तमान में भी देेेश में रक्षाबंधन पर ऐसे कई भाई-बहन हैं जो धर्म की दीवारों को तोड़कर रक्षाबंधन का त्योहार मनाते हैं। इन्हीं भाई-बहनों में गरिमा और नाजिम का नाम भी शुमार है। पिछले 12 साल से गरिमा रक्षाबंधन का त्योहार अपने मुस्लिम भाई नाजिम के साथ मनाती आ रही हैं।
ठाकुरद्वारा निवासी गरिमा ने पहली बार वर्ष 2010 में मोहम्मद नाजिम को भाई मानते हुए राखी बांधी थी। इसके बाद से यह सिलसिला हर साल चला आ रहा है। मुस्लिम परिवार से होने के बावजूद नाजिम रक्षाबंधन के त्योहार को उल्लास के साथ मनाते हैं। पेशे से व्यापारी नाजिम रक्षाबंधन के दौरान अगर शहर से बाहर भी हों तो त्योहार के दिन वह हर हाल में लौटकर आ जाते हैं। उनका कहना है कि भाई-बहन के इस पवित्र त्योहार को वह किसी भी हाल में छोड़ नहीं सकते हैं। शहर से बाहर होने पर उन्हें पता रहता है कि रक्षाबंधन के दिन गरिमा उनका घर पर इंतजार कर रही होगी। वहीं गरिमा का कहना है कि भाई-बहन का रिश्ता संसार का सबसे पवित्र और खूबसूरत रिश्ता है। इस रिश्ते में धर्म और जाति बंधन के लिए कोई जगह नहीं है।
गरिमा ने शादी से पूर्व नाजिम को राखी बांधने की शुरुआत की थी। अब शादी होने के बाद भी वह हर साल रक्षाबंधन पर नाजिम को राखी बांधकर त्योहार मनाती हैं। दोनों के परिवार भी इस पवित्र त्योहार के माध्यम से एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। परिवार वालों का कहना है कि हमारा देश कई प्रकार के फूलों का बना गुलदस्ता है। त्योहार, संस्कृति और परंपराएं हमें एक दूसरे से जुड़ने का मौका देती हैं। धर्म और जाति के नाम पर भेदभाव करने की बजाय अगर हम मिलकर रहेंगे तभी देश और समाज तरक्की करेगा। संवाद