बागेश्वर। अतीत में बागेश्वर का ताम्र उद्योग पूरे कुमाऊं में विख्यात था। कभी खरही पट्टी के दर्जनों गांवों के 200 से अधिक परिवारों को रोजगार मिलता था। मशीनीकरण ने ताम्र उद्योग पर गहरी चोट की है। अब खर्कटम्टा गांव के केवल चार परिवारों ने ताम्रकला संजो कर रखी है। बागेश्वर का ताम्र उद्योग एक जिला एक उत्पाद में शामिल होने के बाद भी ताम्र शिल्पियों के दिन नहीं बहुरे हैं।
अतीत में बागेश्वर के ताम्र उद्योग की धमक का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पहाड़ के हर मेले में बागेश्वर के खरही पट्टी के ताम्र शिल्पियों की दुकानें सजी रहती थीं। लोग मेलों में बागेश्वर के तांबे के बर्तनों को खरीदने के लिए लालायित रहते थे। तब खरही पट्टी के खर्कटम्टा, बेहरगांव, बिरखानी, बिनसर, सकीड़ा, गैर, टम्ट्यूड़ा, कनौली समेत दर्जनों गांवों में करीब 200 के करीब परिवार ताम्रकला से जीविकोपार्जन करते थे। इन गांवों को तांबे के बर्तनों के लिए ही जाना जाता था।
अब केवल खर्कटम्टा गांव में चार परिवार ताम्रशिल्प से जुड़े हुए हैं। यह लोग तांबे के गागर और अन्य परंपरागत बर्तनों के साथ ही वॉटर फिल्टर और अन्य सजावटी वस्तुएं बनाकर ताम्रशिल्प को जीवित रखने का प्रयास कर रहे हैं।
कोट-
खरही पट्टी की ताम्रकला को पटरी पर लाने के लिए सरकार को ठोस उपाय करने चाहिए। उद्योग केंद्र में प्रोसेसिंग मशीनेें लगाई गई हैं। ताम्रशिल्पी वहां जाकर तांबे की सामग्री नहीं बना सकते हैं। ताम्र शिल्पियों को आधुनिक मशीन उपलब्ध कराने के साथ ही बाजार उपलब्ध कराना चाहिए, तभी इस कला और इसके जानकारों को राहत मिलेगी।
सुंदर लाल ताम्रशिल्पी खर्कटम्टा बागेश्वर।
ताम्र शिल्पियों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। जिला उद्योग केंद्र में तांबे के उत्पाद बनाने के लिए प्रोसेसिंग मशीनें लगाई गई हैं। सरकारी योजनाओं का लाभ ताम्रशिल्पियों को दिया जा रहा है।
जीपी दुर्गापाल महाप्रबंधक जिला उद्योग केंद्र बागेश्वर