बागेश्वर जिले की मांग के साथ ही उठी अलग ब्लाक बनाने की मांग 28 बरस बाद भी पूरी नहीं हो सकी है। ब्लाकों के नहीं बनने से सुदूरवर्ती गांवों का अपेक्षित विकास नहीं हो पा रहा है। बोरबलड़ा जैैसे उच्च हिमालयी क्षेत्र के गांव के लोग दूसरे दिन ब्लाक मुख्यालय पहुंचते हैं।
गांवों के सड़कों से नहीं जुड़ने के कारण अधिकारी भी गांवों का भ्रमण करने से कतराते हैं। अलग राज्य बनने के बाद भी ग्रामीणों को छोटी प्रशासनिक इकाई का लाभ नहीं मिलने के कारण उनमें रोष है।
मालूम हो कि बागेश्वर जिले के साथ ही चौड़ास्थल, शामा, कांडा, कमेड़ीदेवी, कठपुड़ियाछीना, रवांईखाल और लौबांज, नाकुरी को अलग ब्लाक बनाने की मांग उठी थी। जिला तो 15 सितंबर 1997 को बन गया था, लेकिन अलग ब्लाकों की मांग पिछले 28 साल बाद भी पूरी नहीं हो सकी है।
क्षेत्र के लोगों को आशा थी कि अलग राज्य बनने के बाद सरकारें इन लंबित मांगों को पूरा कर देंगी, लेकिन स्थिति आज भी जस की तस ही है। मालूम हो कि कपकोट ब्लाक के उच्च हिमालयी क्षेत्र के बोरबलड़ा और कीमू के ग्रामीण दूसरे दिन कपकोट ब्लाक पहुंचते हैं जबकि बागेश्वर ब्लाक के ठांगा, नंदीगांव बोहाला के ग्रामीण एक दिन में यहां आकर अपना काम नहीं करा पाते हैं।
दूरस्थ क्षेत्र के गांवों के लोगों का एक दिन में होने वाले काम में दो से तीन दिन तक लग जाते हैं। कई बार ग्रामीणों को वहां अधिकारी मिलते ही नहीं हैं। इन परिस्थितियों में ग्रामीणों को कई परेशानियां झेलनी पड़ती हैं। सुदूरवर्ती गांवों के लोगों को समय पर विकास योजनाओं की जानकारी तक नहीं मिल पाती है।
अधिकारियों के समय से भ्रमण नहीं करने के कारण वहां धीमी गति से चल रहे विकास योजनाओं के निर्माण में भ्रष्टाचार होने की शिकायतेें आती हैं। अलग ब्लाकों का गठन नहीं से गांवों में चलने को पगडंडियां तक नहीं बनी हैं। गांवों में पीने के पानी की योजनाएं भी नहीं बनी हैं।
स्वास्थ्य, शिक्षा, बिजली की समस्याएं मुंह बाएं खड़ी हैं। रोजगारपरक योजनाओं की स्थापना के कोई कदम नहीं उठ रहे हैं। अपेक्षित विकास नहीं होने के कारण गांवों से पलायन जोरों पर है। जंगली जानवरों के बढ़ते प्रभाव के कारण कई लोग कृषि, बागवानी और औद्यानिकी को छोड़ने को मजबूर हैं।
रायशुमारी के बाद भी कुछ नहीं हो सका
बागेश्वर। ब्लाक जन संघर्ष समिति कठपुड़ियाछीना के अध्यक्ष नरेंद्र सिंह रावत ने बताया कि शासन के निर्देश पर ब्लाक कर्मियों ने गत वर्ष कठपुड़ियाछीना और कांडा ब्लाक गठन के लिए लोगों की रायशुमारी की, लेकिन इस पर भी आज तक कुछ नहीं हो सका है। उन्होंने चेेतावनी दी कि यदि ब्लाक का गठन शीघ्र नहीं हुआ तो आंदोलन शुरू कर दिया जाएगा।
ब्लाक मुख्यालयों से 25 से 60 किमी दूर हैं गांव
बागेश्वर। विषम भौगोलिक स्थितियों को समेटे दूरस्थ गांवों से ब्लाकों की दूरी 30 से 65 किमी है। विकास के तमाम दावों के बावजूद कपकोट ब्लाक के कुंवारी, बोरबलड़ा, झूनी, मिकिलाखल्पट्टा, कीमू, बास्ती, बागेश्वर ब्लाक का ठांगा, तुषरेड़ा समेत कई गांव सड़क से नहीं जुड़ सके हैं। सड़क नहीं होने के कारण गांवों का अपेक्षित विकास नहीं हो पा रहा है।
राज्य सरकार को अलग ब्लाकों के गठन के प्रस्ताव विधानसभा में पास कराकर केंद्र को भेजना चाहिए। ब्लाकों के गठन के लिए राज्य सरकार को रुचि दिखानी चाहिए। गांवों के अपेक्षित विकास नहीं होने के लिए राज्य सरकार ही दोषी है।
- चंदन राम दास, विधायक बागेश्वर।
मुख्यमंत्री हरीश रावत के माध्यम से अलग ब्लाकों के गठन के प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजे जाएंगे। राज्य सरकार हर गांव को सड़क से जोड़ने और गांवों के सर्वांगीण विकास के लगातार काम कर रही है। इनका लाभ ग्रामीणों को मिल भी रहा है।
- ललित फर्स्वाण विधायक कपकोट।