भूगर्भ वेत्ताओं की रिपोर्ट पर अविभाजित उप्र सरकार ने नब्बे के दशक में जिनखोला गांव को भूस्खलन की दृष्टि से अति संवेदनशील घोषित कर दिया था। विस्थापन की फाइल पहले उप्र सचिवालय अब उत्तराखंड सचिवालय में धूल फांक रही है। बारिश के मौसम में स्थानीय प्रशासन विस्थापन की कार्यवाही शासन स्तर पर चल रही है कहकर ग्रामीणों को भरोसा देने के सिवाय कुछ नहीं कर पाता है। आपदा प्रभावित 74 परिवार अब विस्थापन की उम्मीद छोड़ चुके हैं।
जिनखोला गांव ब्लॉक मुख्यालय से मात्र चार किमी दूरी पर एक पहाड़ी की तलहटी पर है। गांव में नब्बे के दशक तक मात्र 44 परिवार थे। अब आंक ड़ा 74 परिवारों का है। 1991 में गांव के सिराने पर भारी भूस्खलन होने के साथ साथ हर घर की दीवारें धंस गई थी । भूगर्भ वेत्ता प्रोफेसर खड़क सिंह वल्दिया के अनुसार गांव की जमीन पथरीली के साथ-साथ सिमार वाली है। जो बारिश में खिसकती रहती है। अल्मोड़ा के पूर्व डीएम ने 1991 में आई आपदा के समय जिनखोला और पप्या गांव का दौरा कर गांव को भूस्खलन की दृष्टि से संवेदनशील घोषित कर दिया था। विस्थापन के लिए शासन को पत्र लिखा था। गांव के वयोवृद्ध सामाजिक कार्यकर्ता भवान सिंह भाकुनी, पूर्व प्रधान आनंदी बोरा ने बताया कि बागेश्वर के पूर्व डीएम डीएस गर्ब्याल ने गांव का दौरा कर शासन को विस्थापन के लिए लिखा। विस्थापन की फाइल सचिवालय में अभी भी धूल फांक रही है।
दीगर है कि बारिश के सीजन में जिनखोला गांव के हर घर के पहली मंजिल में पानी रिस के आता है। घरों की दीवारों में दरारें आ जाती हैं। मंगलवार की शाम गांव की एक पहाड़ी दरकने के बाद गांव की लोगों की रात की नींद हराम हो गई है। हालांकि प्रशासन ने गांव के एक दर्जन से अधिक परिवारों से घर छोड़कर पंचायत घर और इंटर कालेज गागरीगोल में शरण लेेने का फरमान जारी कर दिया है।
जिनखोला में विकास योजना नहीं होती टिकाऊ
गरुड़ (बागेश्वर) जिनखोला गांव में विभिन्न विकास मदों से बनी विकास योजनाओं लंबी अवधि तक सुरक्षित नहीं रहती है। बीडीओ गोविंद सिंह बोरा ने बताया कि पथरीली जमीन होने के कारण पेयजल योजना, सिंचाई गूलों और संपर्क मार्गों में दरारें आना सामान्य बात है।
जीआरडी पी आपदा की दृष्टि से संवेदनशील गांव जिनखोला