चट्टान से मजबूत हौसले के बूते हिमालय की चोटी फतह करने वाली देश की पहली महिला और खुद को पहाड़ की बेटी बताने वालीं बछेंद्री पाल का दिल उत्तराखंड में मची तबाही से छलनी है।
वह इस प्रलय के लिए कुदरत से बेजा छेड़छाड़ को जिम्मेदार मानती हैं।
पहाड़ों पर जब कुदरत अपना कहर बरपा रही थी तो सैकड़ों मील दूर रहते हुए भी बछेंद्री का दिल रो रहा था। इससे पहले उन्होंने पहाड़ों पर ऐसी तबाही न कभी देखी और न कभी सुनी।
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बछेंद्री पाल 24 मई 1954 को उत्तरकाशी जिले के नाकुरी गांव में पैदा हुईं। लेकिन चमत्कार उन्होंने करीब 30 साल बाद किया। 23 मई 1984 वह दिन है, जब बछेंद्री ने अपने कभी न थकने वाले कदमों से दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर कामयाबी की कहानी लिखी। वह माउंट एवरेस्ट के शीर्ष पर थीं।
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हाल में मची तबाही का बड़ा हिस्सा उत्तरकाशी के हिस्से आया है। जिन गांवों को बछेंद्री ने करीब से देखा, उनका नामोनिशान तक मिट चुका है।
पहाड़ों पर कुदरत की जब भयावहता सामने आई, तो बछेंद्री भी खुद को नहीं रोक सकीं। टाटा रिलीफ कमेटी की तरफ से भेजे गए एक दल की सदस्य के तौर पर बछेंद्री पाल इन दिनों उत्तरकाशी में लोगों की मदद कर रही हैं।
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अमर उजाला से खास बातचीत में बछेंद्री ने कहा, 'पहाड़ों पर जरूरत से ज्यादा इंसानी दखल इस त्रासदी की वजह है।' वो पहाड़ों पर पर्यटन को पूरी तरह नकारती तो नहीं, लेकिन वो इसकी तरफदार हैं कि इसकी कोई न कोई हद तय होना जरूरी है।
वो कहती हैं कि जब पर्यटन बढ़ता है तो इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत होती है और इसके लिए सड़कें, बांध और पावर स्टेशन बनाए जाते हैं, जो धीरे-धीरे पहाड़ों को खोखला कर देते हैं।
बछेंद्री कहती हैं, 'पहाड़ों पर सुख-सुविधाएं जरूरी हैं, लेकिन इसके लिए संतुलित विकास का खाका भी उतना ही जरूरी है। पहाड़ों की भौगोलिक परिस्थितियों का ख्याल रखकर इसे तैयार किया जाना चाहिए।'
अपने राहत मिशन के बारे में बछेंद्री बताती हैं कि देश में कहीं भी प्राकृतिक आपदा हो, टाटा रिलीफ कमेटी हमेशा पीड़ितों की मदद में बढ़-चढ़कर सहयोग करती है।
इस मिशन में कमेटी ने फिलहाल उत्तरकाशी के तबाह हो चुके तीन गांवों को नए सिरे से बसाने का जिम्मा उठाया है। ये दल पहले इन लोगों की फौरी जरूरतों को पूरा करेगा, फिर उनके उजड़े घरों को फिर से बसाने के मिशन में लगेगा। इस मिशन के तहत इन गांवों के करीब 200 परिवारों की मदद की जाएगी।
बछेंद्री बताती हैं इससे पहले भी टाटा रिलीफ कमेटी गुजरात के भुज में भूकंप, बिहार में कोसी की बाढ़ और देश में कहीं भी कोई आपदा हो लोगों का दर्द बांटने में आगे रही है। इस इलाके में बरपे पहाड़ से दर्द से कराह रहे लोगों के कुछ आंसू पोंछ सकें, बछेंद्री और उनकी टीम की फिलहाल यही छोटी सी कोशिश है।