मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने पिता की आज्ञा का पालन कर 14 वर्ष जंगल में बिताए थे लेकिन अशोक का वनवास श्रीराम से छह वर्ष ज्यादा है। 20 वर्ष के इस वनवास में वह मां के आंचल, पिता के प्रेम और भाइयों के अपनत्व से दूर रहा।
अपनों के लिए अशोक के आने की आस वक्त के साथ टूटी तो दिल ने उसे मृत मान लिया था लेकिन तकदीर हमेशा निराशा लेकर नहीं आती।
जुदाई का लंबा दर्द पहली नवरात्र को दूर
जुदाई का यह लंबा दर्द पहली नवरात्र को तब दूर हुआ, जब अपनों से अपना मिले। 32 साल के अशोक के पास अब मां भी है पिता और भाइयों का पूरा परिवार भी।
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बिछुड़ाव की पीड़ा को झेला
यह कहानी बेशक किसी फिल्म सरीखी लगती है लेकिन रीयल लाइफ में झारखंड के अशोक प्रसाद गुप्ता ने अपनों से लंबे बिछुड़ाव की पीड़ा को झेला है।
20 साल पहले (उम्र 12 साल) अपने पैरों पर खड़ा होने के जुनून में अशोक अपने गांव माइल मटलौंग, थाना मनिका, जिला लातेहर झारखंड से भाग गया था। परिवार ने कहां नहीं खोजा लेकिन अशोक नहीं मिला।
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इस बालक ने घर से उस वक्त भागने के बाद दिल्ली, पंजाब, हरियाणा जैसे राज्यों में मजदूरी की। कभी होटलों में बर्तन मांजे और दो वक्त की रोटी जुटाई। आठ साल इधर-उधर भटकने के बाद अशोक कालाढूंगी आ गया।
स्थानीय लोगों के लिए बन गया ‘बिहारी बाबू’
यहीं मजदूरी करने लगा और स्थानीय लोगों के लिए बन गया ‘बिहारी बाबू’। इसी नाम से अशोक की यहां पहचान है। अशोक को उसके परिवार से मिलाने में जगत सिंह मंगोलिया और संतोष साह का भी कम योगदान नहीं है।
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वार्ड-7 के जगत सिंह ने झारखंड के भवन ठेकेदार संतोष को अशोक का दर्द बता उसके परिजनों का पता लगाने की अपील की तो बिछड़े अपने से मिल गए। शनिवार को जब अपनों से मिलने की घड़ी आई तो अशोक की आंखों में खुशियों के आंसू थे।
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पिता कपड़ा व्यापारी
पिता गोपाल प्रसाद गुप्ता, माता कमला देवी, भाई संतोष प्रसाद गुप्ता, संजय प्रसाद गुप्ता अपने अन्य अन्य परिजनों में राजू प्रसाद गुप्ता, दिगंदर प्रसाद गुप्ता यहां चांदनी चौक स्थित तेज सिंह सैनी के घर पहुंचे।
अशोक यहीं किराए में रहता है। मां और पिता ने अपने लाल को सीने से लगा लिया। अशोक के पिता कपड़ा व्यापारी हैं। उसके एक छोटे भाई और दो बहनों की शादी हो चुकी है।
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स्थानीय लोग भी गवाह बने
पिता बताते हैं कि हमने बेटे को मृत मान लिया था लेकिन आज पहली नवरात्र को मां ने उन्हें उनका बेटा लौटाया है। यह पल कभी भुलाया नहीं जाएगा। अपनों से मिलन की इस घड़ी के स्थानीय लोग भी गवाह बने। 12 साल बिहारी बाबू के नाम से जाना जाने वाला अशोक आज यहां से खुशी-खुशी विदा हो गया...।