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विकास की बाट जोह रहा है स्वतंत्रता सेनानी पंडित देवी दत्त तिवारी का गांव

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स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पंडित देवी दत्त तिवारी परिवार के साथ। - फोटो : ALMORA
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अल्मोड़ा। आजादी की लड़ाई में हर मोर्चे पर आगे रहने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पंडित देवी दत्त तिवारी का पैतृक गांव डोबा आजादी के 74 सालों बाद भी विकास के लिए तरस रहा है। उन्होंने आजादी के आंदोलनों में भाग लिया और कई बार जेल भी गए। आजादी के कई सालों बाद भी डोबा में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की प्रतिमा तक नहीं लग सकी है। गांव में सड़क तो पहुंची हैं लेकिन डामरीकरण न होने से यह खस्ताहाल है।
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जिले के डोबा गांव निवासी पंडित देवी दत्त तिवारी ने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया। वह छात्र नेता भी रहे। तीन अगस्त 1942 को छात्रों की हड़ताल में सक्रिय भाग लेने के फलस्वरूप रैमजे स्कूल के तत्कालीन हेडमास्टर के आदेश पर उन्हें 15 अगस्त 1942 को दो साल के लिए स्कूल से निष्कासित किया गया। सरकार ने छह माह के कठोर कारावास और 20 रुपये अर्थदंड न देने पर फिर से 15 दिन के कठोर कारावास की सजा सुनाई। नौ दिसंबर 1942 को जेल से मुक्त हुए। जेल से छूटने के बाद शिक्षा पूरी कर 1949 में राजस्व विभाग में विभिन्न पदों पर काम किया। पटवारी ट्रेनिंग स्कूल के उप प्रधानाचार्य पद से 1985 में सेवानिवृत्त हुए। देवी दत्त तिवारी की पत्नी जयंती तिवारी का दो माह पूर्व निधन हो चुका है। उनके सबसे बड़े बेटे डॉ. अंबा दत्त तिवारी एनसीईआरटी दिल्ली में सेवारत थे, जिनका हाल में ही निधन हुआ है। दूसरे नंबर के गौरी दत्त तिवारी तहसीलदार थे, जिनका हाल में ही निधन हुआ है। चंद्र दत्त तिवारी एनएसडी से सेवानिवृत्त हो चुके हैं। चौथे नंबर के गणेश दत्त तिवारी जल निगम अल्मोड़ा में कार्यरत हैं। उनके कुछ परिजन नगर के त्योनरा मोहल्ला में रहते हैं। इसके बाद भी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का पैतृक गांव डोबा विकास के लिए तरस रहा है। उनकी बहू राधा तिवारी ने बताया कि गांव में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के नाम पर कुछ भी नहीं है। डोबा गांव में स्वतंत्रता सेनानी की प्रतिमा तक नहीं लगी है। गांव में सड़क तो बनी है लेकिन डामरीकरण न होने के कारण सड़क बदहाल है।
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पंडित देवी दत्त तिवारी का पैतृक गांव डोबा का आज भी वह विकास नहीं हुआ है जो होना चाहिए था। उनकी स्मृति में गांव में कुछ भी नहीं है। ऐसे में आने वाली पीढ़ी स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के त्याग और बलिदान से कैसे रूबरू हो सकेगी, यह सोचनीय है।
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- चंद्र दत्त तिवारी, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के पुत्र।
डोबा में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पंडित देवी दत्त तिवारी की प्रतिमा तक न लगाना स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की अनदेखी है। उनके नाम पर गांव में संग्रहालय भी बनाया जाना चाहिए। इसमें उनसे जुड़ी चीजें रखी जा सकें ताकि आने वाली पीढ़ी उनके बारे में जान सके।
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-राधा तिवारी, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की बहू।
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