बता दें कि, पहाड़ों में चल रहे ग्रामीण विकास कार्यक्रम अभी रोजी-रोटी कमाने के सार्थक विकल्प पैदा करने में विफल रहे हैं। मेरा मोटा अनुमान है कि कोविड-19 के दौरान पहाड़ में अपने घर लौटे 90 प्रतिशत से ज्यादा लोग और परिवार वापस शहरों में अपने काम-धंधे में लौट चुके हैं। इससे साबित होता है कि पहाड़ में चल रहे सरकारी कार्यक्रम विफल हो चुके हैं, फिर चाहे इसका कारण इन कार्यक्रमों का दोषपूर्ण प्रारूप हो या क्रियान्वयन के स्तर पर योजनाओं में लीकेज होना हो। शहरी जीवनशैली के आदी हो चुके लोग, बच्चे और परिवार पहाड़ के ग्रामीण परिवेश से तालमेल नहीं बैठा पाए। ‘
ठंडू से ठंडू मेरा पहाड़ा की हवा ठंडी, पाणी रे ठंडू’ जैसे गीतों से बनी सोच ने गांव में रुकने के उनके फैसले को नहीं बदला और इस प्रकार वे ‘मुझे पहाड़ी पहाड़ी मत बोलो’ का राग ही अलापते रह गए। जब हालत यह हों कि राज्य के विधायक प्रस्तावित राजधानी गैरसैंण में शीतसत्र भी नहीं कराना चाहते हैं, तो इससे दिख जाता है कि पहाड़ी इलाकों में सुविधाओं और इंफ्रास्ट्रक्चर का क्या स्तर होगा। पहाड़ से निकले लोगों का पहाड़ों में घर वापसी यानी रिवर्स माइग्रेशन का सफर अभी बहुत दूर की कौड़ी है। सभी दलों को इसके लिए जरूरी कदम उठाने चाहिए। -देवेंद्र कुमार बुड़ोकोटी, समाजसेवी