अल्मोड़ा। जिले में रेशम उत्पादन को अब मनरेगा योजना का सहारा है। चालू वित्तीय वर्ष में रेशम विभाग ने मनरेगा के माध्यम से जिले के विभिन्न क्षेत्रों में 120 हेक्टेयर क्षेत्र में शहतूत के पौधे लगाने का लक्ष्य रखा है। हवालबाग ब्लॉक के आधारमाफी गांव में वन पंचायत की सात एकड़ भूमि में स्थापित फार्म के विकास और भवन निर्माण के लिए जिला योजना में 30 लाख रुपये का प्रावधान किया गया है।
जिले में रेशम उत्पादन की काफी संभावना हैं। सोमेश्वर घाटी, जैंती, लमगड़ा, स्याल्दे, हवालबाग ब्लॉक के खूंट की जलवायु शहतूत के पौधों के रोपण, रेशम उत्पादन के लिए उपयुक्त है। पहले क्लस्टर विकास योजना से विभाग कृषकों को शहतूत के पौधे, कीटपालन सामग्री उपलब्ध कराता था, पर यह योजना 2012 से बंद हो गई।
इसके बाद से विभाग को बजट नहीं मिला। जिले के विभिन्न क्षेत्रों में पूर्व में करीब ढाई सौ एकड़ क्षेत्र में शहतूत के पौधे रोपे गए। हर साल मात्र 25 कुंतल रेशम उत्पादन हो रहा है। रेशम के कोकून का बाजार मूल्य 250 से 300 रुपये प्रति किलो है। उत्तराखंड कोऑपरेटिव फेडरेशन प्रेमनगर कोकून खरीदता है।
एक हेक्टेयर क्षेत्र में रोपित 300 शहतूत के पौधे दो साल बाद उत्पादन देने लगते है। इनसे कृषक साल में 15 से 20 हजार रुपये की अतिरिक्त आय अर्जित कर सकता है। सहायक निदेशक रेशम अरविंद पांडे ने बताया कि चालू वित्तीय वर्ष में स्याल्दे के पालपुर में 59 हेक्टेयर, लमगड़ा ब्लॉक के ढौरा, जैंती में 30-30 हेक्टेयर क्षेत्र में मनरेगा योजना के माध्यम से शहतूत के पौधों का रोपण किया जाएगा।
वहीं जिला योजना में 30 लाख रुपये का प्रस्ताव किया गया है। धनराशि अवमुक्त होने पर खूंट के पास आधारमाफी गांव में वन पंचायत की सात एकड़ भूमि में स्थापित फार्म को विकसित करने के साथ ही 14 लाख की लागत से कीट पालन भवन बनाया जाएगा।