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चिमाखोली गांव के ग्रामीणों का रोड नहीं तो वोट नहीं का ऐलान

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धौलादेवी विकासखंड का दूरस्थ गांव चिमाखोली। - फोटो : ALMORA
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अल्मोड़ा। विकासखंड धौलादेवी के अंतर्गत स्वतंत्रता सेनानी स्व. हरिदत्त पांडे का गांव चिमाखोली आजादी के सात दशक बाद भी सड़क नहीं जुड़ सका है। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के परिजनों और ग्रामीणों ने चुनाव बहिष्कार का निर्णय लेेते हुए रोड नहीं तो वोट नहीं का एलान किया है। इस संबंध में भनोली के तहसीलदार के माध्यम से डीएम को ज्ञापन भी भेजा है।
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स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पांडे का चिमाखोली गांव सरयू घाटी और सीमांत जिले पिथौरागढ़ की सीमा से लगा हुआ है। पांडे ने आजाद हिंद फौज के सेनानी के रूप में देश को स्वतंत्रता दिलाने में अहम योगदान दिया। गांव में स्वतंत्रता सेनानी पांडे के परिजनों के साथ ही तीन दर्जन परिवार निवास करते हैं। गांव में सब्जी और फलों का बहुतायत में उत्पादन होता है पर सड़क के अभाव में ग्रामीण उत्पादों को बिक्री के लिए मंडी तक नहीं पहुंचा पाते हैं। गांव के लोग आज भी पांच किमी पैदल चलकर आरा सल्पड़ मार्ग में मयोली आकर सड़क पर पहुंचते है। गांव को यातायात से जोड़ने के लिए वर्ष 2013 में सर्वे हुआ था लेकिन वन भूमि की स्वीकृति के अभाव में गांव सड़क से नहीं जुड़ सका है।
ग्रामीणों का कहना है कि सड़क निर्माण की मांग कई बार शासन प्रशासन से की जा चुकी है, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हो रही है। ग्रामीणों ने सर्वसम्मति से निर्णय लिया है कि विधानसभा चुनाव से पूर्व सड़क निर्माण के लिए शासन-प्रशासन ने सकारात्मक कार्यवाही नहीं की तो वह चुनाव बहिष्कार को बाध्य होंगे। इस संबंध में स्वतंत्रता सेनानी की पत्नी पार्वती देवी समेत ग्रामवासियों ने संयुक्त हस्ताक्षरित ज्ञापन तहसीलदार भनोली के माध्यम से डीएम को भेजा है। वहां पर सेनानी की पत्नी पार्वती देवी, विजय पांडे, गोकुल चंद्र भट्ट, प्रकाश चंद्र जोशी, परमानंद जोशी, पुष्पा देवी, रेखा देवी आदि थीं।
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सड़क निर्माण के लिए मात्र आश्वासन मिले हैं। आजादी के सात दशक बाद भी मात्र पांच किमी सड़क का निर्माण नहीं हो पाया है। जो कि स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हरीदत्त पांडे की उपेक्षा को भी दर्शाता है।
- विजय पांडे, सामाजिक कार्यकर्ता।
सड़क के अभाव में गांव में उत्पादित सब्जी और फलों को घोड़ों और सिर पर ढ़ोकर सड़क तक ले जाते हैं, जिसमें काफी समय और पैसा बरबाद होता है। जिससे उत्पादों की लागत नहीं मिल पाती है।
- पूर्णानंद जोशी।
दशकों से सरकार और जनप्रतिनिधियों से सड़क निर्माण की मांग की जाती रही है, लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही है। सड़क के अभाव में मरीजों को उपचार के लिए डोली में अस्पताल ले जाना पड़ता है।
- गिरीश चंद्र।
चुनाव के समय राजनैतिक दलों के प्रतिनिधि गांव में आते हैं और सड़क निर्माण का भरोसा देते हैं, लेकिन चुनाव के बाद भूल जाते हैं और जनता की सुध नहीं लेते हैं। जिसका खामियाजा ग्रामीणों को भुगतना पड़ता है।
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- महेश चंद्र पांडे।
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