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राज्य बनने के बाद पहाड़ में स्वास्थ्य सेवाओं की हुई दुर्गति

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रानीखेत का ट्रामा सैंटर भवन। संवाद - फोटो : RANIKHET
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रानीखेत (अल्मोड़ा)। उत्तराखंड राज्य बनने के बाद पहाड़ में सबसे अधिक दुर्गति स्वास्थ्य के क्षेत्र में हुई है। सबसे बड़े ब्लाक के रूप में शुमार ताड़ीखेत ब्लाक में भी स्वास्थ्य सेवाओं का हाल बुरा है। प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों का अभाव बना है। जिस कारण छोटी सी बीमारी के लिए लोगों को निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ता है। रानीखेत अस्पताल में ट्रामा सेंटर बना लेकिन 12 साल बाद भी ट्रामा सेंटर का संचालन नहीं हो सका। गंभीर दुर्घटनाओं के मरीज आज भी हल्द्वानी अथवा बड़े शहरों को रेफर होने के लिए मजबूर हो रहे हैं। इधर, चुनाव प्रचार में प्रत्याशी पहाड़ की बहाल स्वास्थ्य सेवाओं को दुरुस्त करने के सब्जबाग दिखा रहे हैं।
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उपमंडल क्षेत्र की बीमार सड़कों में आए दिन वाहन दुर्घटनाएं होती हैं। अन्य स्थानों पर कहीं भी ट्रॉमा सेेंटर नहीं हैं। सन 2000 में राजकीय अस्पताल में एक करोड़ की लागत से ट्रामा सेंटर स्वीकृत हुआ। भवन बनने के बाद 2009 में तत्कालीन भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक ने अल्मोड़ा में भवन का लोकार्पण कर दिया। लेकिन सरकार संसाधन, उपकरण और डॉक्टर जुटाने में नाकामयाब रही। कांग्रेस सरकार भी ट्रामा सेंटर के संचालित करने के सब्जबाग दिखाती रही। 2017 में फिर से भाजपा सरकार आई, उसने भी पहाड़ के स्वास्थ्य सेवाओं की सुध नहीं ली। पिछले 21 सालों में सबसे अधिक दुर्गति स्वास्थ्य सेवाओं की हुई है। ना ही डाक्टरों का पैनल है और ना ही उपकरण। अस्पताल के अधीक्षक डा. केके पांडेय ने बताया कि शासन को पत्र भेजे गए हैं। भवन खाली है, फिलहाल यहां कोविड टीकाकरण चल रहा है।
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-ट्रामा सेंटर के लिए ये डाक्टर हैं जरूरी:
1- न्यूरो सर्जन,
2- आर्थो सर्जन,
3- जनरल सर्जन,
4-रेडियोलॉजिसट
5- एनेस्थेसिस्ट,
6-सीटी स्कैन विशेषज्ञ।
7- पैरा मेडिकल स्टाफ
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