पर्वतीय अंचल में सर्वत्र पूजे जाने वाले ग्वलज्यू को खास तौर पर न्यायकारी देवता के रूप में जाना जाता है। आज भी किसी इंसान को जब कहीं न्याय नहीं मिलता तो वह ग्वल देवता के दरबार में पहुंचता है। यहां तक कि अदालत के निर्णयों से निराश कई लोग आखिर में ग्वलज्यू के मंदिर में अर्जी लगाने पहुंचते हैं।
दूसरी तरफ सच्चे मन से की गई कामना को भी ग्वलज्यू अवश्य पूरा करते हैं। मन्नत पूरी होने के बाद उनके मंदिर में घंटी अर्पित करने की परंपरा है।
ग्वलज्यू के चितई, घोड़ाखाल और अन्य स्थानों में स्थित मंदिरों में हर साल अर्पित की जाने वाली हजारों घंटियां इस बात की सबूत हैं कि ग्वल देवता सच्चे भक्त की मुराद अवश्य पूरी करते हैं।
ग्वलज्यू कुमाऊं में सबसे अधिक पूजे जाने वाले लोक देवता हैं। लोक देवता का मतलब यह है कि कभी वह मनुष्य रूप में थे और उन्होंने इतने महान कार्य किए कि वह देवता के रूप में पूजे जाने लगे। ग्वलज्यू को प्राचीन काल में गढ़ी चंपावत के राजा हलराई का पुत्र माना जाता है।
ग्वलज्यू के अवतरण की कहानी कुछ इस तरह है कि गढ़ी चंपावत के राजा की सात रानियां थीं, लेकिन उनकी किसी से संतान नहीं थी। राजा ने संतान की प्राप्ति के लिए गौर भैरव की भक्ति की।
उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर गौर भैरव ने उन्हें दर्शन देकर कहा कि तुम्हारे भाग्य में संतान नहीं है, लेकिन मैं तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न हूं इसलिए मैं स्वयं तुम्हारे घर में पुत्र के रूप में जन्म लूंगा।
उन्होंने कहा कि मैं इन सात रानियों के गर्भ में पैदा नहीं होऊंगा क्योंकि ये सातों अपने गर्भ में मेरे भार को धारण करने में समर्थ नहीं हैं।
उन्होंने कहा कि अगर तुम्हें मेरी बात स्वीकार है तो अपनी आठवीं शादी पंचनाम देवताओं की बहन देवी कलिंगा से करनी होगी। यही सतवंती देवी अपने गर्भ में मेरे स्वरूप को धारण कर सकती है।
इस पर देवी कलिंगा से राजा हलराई का विवाह संपन्न हुआ। उसके बाद गौर भैरव ने कलिंगा के गर्भ से बालक रूप में जन्म लिया।
जैसे ही आठवीं रानी से बालक पैदा होने की खबर अन्य सात रानियों को पता लगी तो उन्होंने बालक को जान से मारने के इरादे से कहीं दूर छिपा दिया और रानी कलिंगा के सामने सिल बट्टा रख दिया और कह दिया कि उनके गर्भ से यही पैदा हुआ है।
इसके बाद सातों रानियों ने बालक को मारने के कई उपाय किए पर वह इस पर सफल नहीं हुईं। आखिरकार उन्होंने बालक को लोहे के संदूक में बंद करके काली नदी में बहा दिया।
काली नदी में बहकर यह संदूक गोरी नदी में पहुंच गया और संयोग से यह संदूक भाना धीवर नामक एक मछुवारे को मिला। नवजात को पाकर निसंतान धीवर दंपत्ति बहुत खुश हो गए और उन्होंने ही बालक का पालन-पोषण किया।
लगभग आठ-दस साल की उम्र में एक दिन यह बालक काठ (लकड़ी) के घोड़े में सवार होकर राजा हालराई की राजधानी गढ़ी चंपावत की ओर गया। वहां बालक एक स्थान पर अपनी काठ की घोड़ी को पानी पिलाने की बात कहने लगा।
इस पर सातों रानियों ने उपहास करते हुए कहा कि क्या काठ की घोड़ी भी पानी पीती है। इस पर बालक ने व्यंग करते हुए जवाब दिया कि क्या किसी मां के गर्भ से सिल बट्टा पैदा होता है।
इसके बाद सातों रानियों के षड्यंत्र का रहस्य खुल गया और राजा हलराई ने सातों रानियों को उनके अपराध के लिए कठोर दंड दिया और अपने पुत्र कुंवर बाला गोरिया का राज तिलक करके उसे गढ़ी चंपावत के सिंहासन पर बैठा दिया।
फिर वह गौर भैरव, बाला गोरिया, ग्वलज्यू और गोलू देवता आदि नामों से पूजे जाने लगे। बाला गोरिया को बहुत ही न्यायकारी राजा के रूप में जाना जाता था।
पर्वतीय क्षेत्र में आज भी उन्हें न्यायकारी लोक देवता के रूप में पूजा जाता है। चंपावत के अलावा अल्मोड़ा के चितई और भवाली के निकट घोड़ाखाल सहित गांव-गांव में इनके मंदिर हैं।
पहाड़ के अधिकांश लोग इन्हें ईष्ट देवता के रूप में पूजते हैं। आज भी यह मान्यता है कि अगर किसी को अदालत से भी सही न्याय नहीं मिला तो ग्वल देवता के दरबार में उसे न्याय अवश्य मिलता है। मन्नत पूरी होने पर लोग मंदिर में घंटी अर्पित करते हैं।