अल्मोड़ा। एक जमाने में लोग गांधी आश्रमों में जाकर खादी के वस्त्रों की खूब खरीदारी करते थे। गर्मियों में सूती, ऊनी वस्त्रों में कुर्ते, पायजामे हों या फिर जाड़ों में कोट, स्वेटर, टोपी समेत शॉल, कंबलों की खूब डिमांड हुआ करती थी। लेकिन इधर कुछ सालों में पहाड़ में गांधी आश्रमों की स्थिति ठीक नहीं है। 2014 में पहाड़ के गांधी आश्रमों में 117 कर्मचारी कार्यरत थे जो घटकर अब 88 रह गए हैं। इसी तरह कृत्रिम बुनकरों की संख्या भी 580 से घटकर 320 रह गई है। इससे उत्पादन और बिक्री दोनों घट गए हैं।
गांधी आश्रमों में काम करने वाले कर्मचारियों का कहना है कि बीते सालों में जीएसटी से माल काफी महंगा हो गया है। जिसके कारण सामान भी कम आ रहा है और उत्पादन भी घटा है। कामकाज ढीला होने से बुनकर भी कम होते चले गए। इधर कर्मचारियों को पेंशन की सुविधा भी नहीं है। 30 से 35 साल की नौकरी के बाद भी कर्मचारियों का वेतन 12 से 14 हजार के बीच ही है।
गांधी आश्रम चनौदा के अंतर्गत आने वाले अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, बागेश्वर और चंपावत में 2013-14 में 117 कर्मचारी कार्यरत थे। जो वर्ष 18-19 में केवल 88 रह गए हैं। कामगार (कृत्रिम बुनकर) की संख्या 2013-14 में 580 थी जो अब केवल 320 रह गई है। इसी तरह 2013-14 में उत्पादन 212.45 लाख का था जो अब घटकर मात्र 57.29 लाख रह गया है। यही हाल बिक्री में भी है। 2013-14 में खादी सामान की बिक्री 692.47 लाख में थी जो वर्ष 2018-19 में 359.47 लाख रह गई है।
इधर अल्मोड़ा गांधी आश्रम के मैनेजर उमेश चंद्र जोशी का कहना है कि जीएसटी के कारण माल महंगा हो गया है। जिससे उत्पादन और बिक्री दोनों प्रभावित हुए हैं।