फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

अंतर्राष्ट्रीय साधना केंद्र का रूप ले चुका है कसारदेवी का बौद्ध मठ

Tue, 01 Sep 2015 12:36 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो/अल्मोड़ा।
विज्ञापन
विज्ञापन
अल्मोड़ा के निकट कसारदेवी में स्थित बौद्ध मठ बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए अंतर्राष्ट्रीय साधना केंद्र का रूप ले चुका है।
विज्ञापन


यहां देश-विदेश से बौद्ध साधक साधना के लिए आते हैं और एकांत में रहकर तीन साल, तीन माह और तीन दिन की कठिन साधना करते हैं।

अब तक देश-विदेश के सैकड़ों बौद्ध साधक यहां साधना कर चुके हैं। कसारदेवी का यह केंद्र प्रख्यात बौद्ध विद्वान लामा गोविंदा की कर्म स्थली भी रहा है। 

अल्मोड़ा से करीब आठ किमी दूर कसारदेवी का इलाका शुरू से ही आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र माना जाता है। प्राचीन समय से ही यहां अनेक महान संत साधना के लिए आते रहे।

स्वामी विवेकानंद भी हिमालय यात्रा के दौरान यहां आए। जाने माने संत नीब करोरी बाबा, मां आनंदमयी सहित कई अन्य महात्मा यहां पहुंचे।

कसारदेवी मंदिर के पास ही बौद्ध दर्शन और ज्ञान के लिए केंद्र स्थापित है। इसे इवांग छोंग कोटलिंग डिगुग कग्यूत नाम से जाना जाता है।

कसारदेवी की आध्यात्मिक ऊर्जा से प्रभावित होकर बौद्ध विषयों के विद्वान डब्लूवाई इवांस वैंज ने 1933 में यहां अपना निवास बनाया। इवांस वैंज बुक ऑफ डैड नामक प्रसिद्ध पुस्तक के रचियता थे।
विज्ञापन


 बाद में प्रख्यात बौद्ध विद्वान लामा गोविंदा का निवास स्थल भी यही आश्रम रहा। लामा गोविंदा और उनकी पत्नी ली गोतमी को बौद्ध ग्रंथों का अनुवादक माना जाता है।

लामा गोविंदा मूल रूप से जर्मन थे। बाद में वह बौद्ध धर्म में दीक्षित हुए। उन्होंने विश्व आर्य मैत्रेय मंडल की स्थापना की थी। अल्मोड़ा में रहकर उन्होंने तिब्बत की रहस्यमय योग साधना पर अनेक पुस्तकों का अनुवाद किया।

 उनकी लिखी पुस्तक द वे आफ व्ह्वाइट क्लाउड काफी चर्चित रही। इस पुस्तक से उन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति मिली। लामा गोविंदा ने ही 1968 में आश्रम का यह स्थान लामा रिंगझेम को उपलब्ध कराया।

 बाद में लामा रिंगझेम की पत्नी सोनम छोट्म ने इस केंद्र को बौद्ध मठ और अंतर्राष्ट्रीय ध्यान केंद्र स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

पिछले 47 सालों से यह स्थान अंतर्राष्ट्रीय साधना के लिए प्रसिद्ध हो चुका है। अब तक अमेरिका, जर्मनी, सिंगापुर सहित अनेक देशों के सैकड़ों साधक यहां साधना कर चुके हैं।

यहां आने वाले साधकों को तीन साल, तीन माह और तीन दिन की साधना करनी होती है। साधना के बाद विधिवत पूजा होती है और फिर साधक अपने स्थानों को लौटकर बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए काम करते हैं।

पूजन के समय को छोड़कर साधक का पूरी साधना अवधि में दुनिया से संपर्क नहीं रहता। बौद्ध आचार्य (रिंपोछे) उन्हें धार्मिक क्रिया कलाप का प्रशिक्षण देते हैं।
विज्ञापन


 मुख्य मंदिर में भगवान बुद् की भव्य मूर्ति है। इसके अलावा कुछ बौद्ध धर्म से जुड़ी छोटी मूर्तियां भी स्थापित हैं। कहते हैं कि गोविंदा लामा की कर्म भूमि रह चुके इस स्थान से बौद्ध धर्म ही नहीं अन्य समुदायों का भी लगाव बना हुआ है।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें