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आर्थिक तंगी में रो रहा दूसरों को हंसाने वाला कवि

Mon, 06 Apr 2015 11:35 PM IST
हेम कांडपाल/अमर उजाला ब्यूरो, चौखुटिया (अल्मोड़ा)।
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राज्य आंदोलन के दौरान स्वरचित कुमाऊंनी कविताओं से आंदोलनकारियों की हौसलाअफजाई करने वाले आनंद बल्लभ भट्ट का खुद अपना हौसला टूट चुका है। दूसरों को हंसाकर लोटपोट कर देने वाला यह हास्य कवि आर्थिक तंगी के दौर से गुजर रहा है।
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आनंद बल्लभ राज्य आंदोलन के दौरान लोगों को अपनी कविताओं से प्रेरित करते थे। इसके बावजूद न तो उन्हें राज्य आंदोलनकारी माना गया और न ही किसी तरह का रोजगार दिया गया। मुफलिसी में जीवन यापन कर रहे इस कवि की पत्नी गीता भट्ट किसी तरह मजदूरी कर तीन बच्चों को पाल रही है। अपने परिचित से मिलने सोमवार को यहां पहुंचे आनंद बल्लभ ने बताया कि उन्होंने चुनाव के दौरान कई उम्मीदवारों के पक्ष में गीत, कविताएं रचीं। कोई विधायक तो कोई मंत्री बन गया लेकिन उनकी मदद किसी ने नहीं की। आपबीती सुनकार वह रो पडे़ । बताया कि उनका ससुराल कोसी के निकट बिमौला गांव में है।

वह पत्नी, बच्चों के साथ वहीं रहते हैं। उन्हें सिर छिपाने के लिए छोटे से घर की जरूरत है। चारों ओर से निराश आनंद बल्लभ को सीएम हरीश रावत से बड़ी उम्मीद है। कहते हैं कि रावत के चुनाव प्रचार में भी उनके पक्ष में कई कविताएं सुनाई थी। अब देहरादून जाकर उन्हें व्यथा सुनाकर मदद की गुहार लगाएंगे।  
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हाल में लिखित आनंद बल्लभ भट्ट की कविता :

हमर जस मैंस न्हेंतिन, किलैकि हमर पास पैंस न्हेंतिन
क्वे कूं आबारा छू, क्वे कूं विक्षिप्त छू
प्रोग्राम में लोग खूब तालि बजानी
घर हैं क्ये निलिजैसक तो नानतिन थाई बजानी।
मैं आनंद बल्लभ भट्ट छूं, मांस, गहौत, रैंस न्हेंतिन।
अर्थात हमारे जैसा दूसरा मनुष्य नहीं है क्योंकि हमारे पास पैसा नहीं है। कोई आवारा कहता है तो कोई विक्षिप्त बताता है। मैं आनंद बल्लभ भट्ट हूं। उड़द, गहत, रैंस की दाल नहीं है। मेरी कविताएं सुनकर लोग तालियां जरूर बजाते हैं लेकिन जेब खाली होने के कारण घर खाली हाथ गया तो बच्चे थाली बजाने लगते हैं।
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