अल्मोड़ा। नियुक्ति और पेंशन देने समेत विभिन्न मांगों को लेकर आंदोलित एसएसबी स्वयं सेवक कल्याण समिति के बैनर तल गुरिल्लों को कलक्ट्रेट प्रांगण में धरना देते हुए शनिवार को चार हजार दिन पूरे हो गए हैं। धरने के दौरान गुरिल्लों ने तख्तियां लेकर सरकार के खिलाफ नारे लगाए।
समिति के केंद्रीय अध्यक्ष ब्रह्मानंद डालाकोटी ने कहा कि 1962 में भारत-चीन युद्ध के बाद तत्कालीन सरकार ने विश्व के कई देशों की सुरक्षा व्यवस्थाओं के अध्ययन के बाद सीमा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए एसएसबी का गठन किया था। जिसके द्वारा देश की सीमाओं से लगे सैकड़ों गांवों में रहने वाले युवक-युवतियों को छापामार (गुरिल्ला) युद्ध में दक्ष किया गया। गुरिल्लों को सीमा पर निगरानी के लिए विशेष खुफिया कार्यों का भी प्रशिक्षण दिया गया था।
वर्तमान में सीमा पर 1962 से भी अधिक जटिल स्थितियां हैं। सीमावर्ती क्षेत्र की और अधिक निगरानी की जरूरत है। जिसमें गुरिल्ले महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकते हैं, लेकिन सरकार लगातार गुरिल्लों की उपेक्षा कर रही है।
वक्ताओं ने कहा कि सरकार देश की सुरक्षा के लिए खरबों के अस्त्र-शस्त्र तो खरीद रही है पर गुरिल्लों की उपेक्षा कर रही है। सरकार ने एसएसबी की ओर से नौ मई 2011 को भेजी गई सिफारिशों को भी किनारे रख दिया है। वहीं राज्य सरकारें अपने ही शासनादेशों पर अमल नहीं कर रही हैं, जबकि आंतरिक सुरक्षा में भी गुरिल्लों का बेहतर उपयोग हो सकता है।
उन्होंने कहा कि कोरोना काल में गुरिल्ले शांतिपूर्वक धरना दे रहे हैं। जैसे ही स्थितियां सामान्य होंगी गुरिल्ले आंदोलन तेज करें। धरने पर ब्रह्मानंद डालाकोटी, आनंदी मेहरा, शांति देवी, सरोजनी, विजय प्रकाश जोशी, संजय बगड़वाल, प्रेम बल्लभ कांडपाल, बसंत सिंह, किशन सिंह, गोपाल राम, फनी राम, गोपाल सिंह राणा, बसंत लाल आदि बैठे