अल्मोड़ा जिले में जंगल की आग का कहर जारी है। आए दिन लोग इसकी चपेट में आकर मौत के मुंह में समा रहे हैं तो कई जीवन और मौत से संघर्ष कर रहे हैं। हैरानी है कि जिले के किसी भी अस्पताल में आग में झुलसे लोगों के इलाज की कोई सुविधा नहीं है। करोड़ों की लागत से खोले गए मेडिकल कॉलेज के साथ ही किसी भी अस्पताल में बर्न वार्ड तक नहीं है।
यदि स्थानीय स्तर पर बर्न वार्ड होता तो बिनसर में जंगल में लगी आग की चपेट में आने से झुलसे चार घायलों को हायर सेंटर रेफर नहीं करना पड़ता। छह लाख की आबादी वाले अल्मोड़ा जिले में नौ सीएचसी, छह पीएचसी, जिला, महिला अस्पताल, बेस के साथ ही 425 करोड़ रुपये की लागत से बने मेडिकल कॉलेज तक में बर्न वार्ड नहीं है। दीपावली में पटाखे या जंगल की आग के अलावा किसी हादसे में कोई अनहोनी हो जाए तो प्रभावित लोगों के लिए हल्द्वानी, बरेली रेफर करना मजबूरी है।
बृहस्पतिवार को ही बिनसर में जंगल की आग में चार वन कर्मी बुरी तरह झुलस गए और उन्हें उपचार के लिए मेडिकल कॉलेज के अधीन बेस अस्पताल लाया गया। यहां बर्न वार्ड नहीं होने से अस्पताल प्रबंधन ने उपचार से हाथ पीछे खींचते हुए सभी को हायर सेंटर रेफर कर औपचारिकता निभा दी। यदि स्थानीय स्तर पर बर्न वार्ड होता तो घायलों को समय पर उपचार नसीब होता और परिजनों को उन्हें लेकर हायर सेंटर की दौड़ नहीं लगानी पड़ती।
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मेडिकल कॉलेज में नहीं है प्लास्टिक सर्जन
अल्मोड़ा। आम तौर पर आगजनी की घटना में झुलसे लोगों के उपचार के लिए प्लास्टिक सर्जन जरूरी है, लेकिन जिले के सबसे बड़े अस्पताल बेस और मेडिकल कॉलेज में प्लास्टिक सर्जन तक तैनात नहीं हैं। आगजनी की घटनाओं में घायल लोगों का प्राथमिक उपचार सामान्य चिकित्सक करते हैं।
मेडिकल काॅलेज में ब्लड बैंक भी नहीं
जिले में स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव भी कई बार यहां आपात स्थितियों में मुसीबत का सबब बनता है। वनाग्नि समेत अन्य घटनाओं में झुलसने के कई मामलों के सामने आने के बाद भी अभी तक अल्मोड़ा मेडिकल कॉलेज में ब्लड बैंक संचालित किया जा सका है। मेडिकल कालेज रक्त के लिए जिला अस्पताल में स्थापित ब्लड बैंक पर निर्भर है। लेकिन कई बार जरूरत पड़ने पर वहां भी खून उपलब्ध नहीं हो पाता है।
जिला अस्पताल में बर्न वार्ड नहीं है। आगजनी की घटनाओं में सामान्य रूप से घायल मरीजों का उपचार अस्पताल में तैनात चिकित्सक करते हैं।
- डॉ. एचसी गड़कोटी, पीएमएस, जिला अस्पताल।